इंदौर का स्वछता में एक बडा कदम, गीले कचरे से बायो सीएनजी बनाने एशिया के सबसे बड़े गोबर धन प्लांट का उद्घाटन।

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मध्य प्रदेश के नाम शनिवार को एक और उपलब्धि दर्ज की गई । गीले कचरे से  बायो सीएनजी बनाने के एशिया के सबसे बड़े गोवर्धन प्लांट का वर्चुअल लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया ।

इस प्लांट में हर ना सिर्फ हर दिन 550 टन गीले कचरे का प्रसंस्करण होगा । बल्कि इससे शहर के पर्यावरण की सेहत भी सुधरेगी। यह प्लांट 100% गीले कचरे से संचालित होगा।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इंदौर के ऐसे प्रयासों की प्रशंसा करते हुए अन्य शहरों को इससे सीख लेने की सलाह  भी दी । दरअसल यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के विकसित देश शहर कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए जूझ रहे हैं, जबकि मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर ने न सिर्फ गीले कचरे से बायो सीएनजी बनाई बल्कि इसके बाद बची गाद का उपयोग भी खाद बनाने में कर लिया।

यहां गाद से प्रतिदिन 100 टन खाद बनेगी जो जमीन को उर्वर बनाने में सहायक होगी।  इस प्रक्रिया के बाद बचने वाले गंदे पानी का उपयोग कचरे की लुगदी बनाने और पौधों की सिंचाई करने में भी होगा।
बायो सीएनजी प्लांट के संचालन में खर्च होने वाली बिजली भी सोलर पैनल लगाकर बताई जाएगी। 

इन प्रयासों से इंदौर अब दुनिया के सबसे स्वच्छ शहर में अपना नाम शामिल करने दिशा में भी कदम बढ़ा चुका है
क्या यह चमत्कार नहीं कि जिस राज्य के नगरों और गांवों की गलियां छह सात वर्ष पहले तक कचरे से पटी रहती थी, जिस राज्य के नागरिक कूड़े कचरे से सटे रहने वाले मोहल्ले में रहने के लिए अभिशप्त भी थे और अभ्यस्त  भी हो गए थे,उसी राज्य के शहर इंदौर में एशिया का  सबसे बड़ा प्लांट बना है।

जिसमें गीले कचरे को गैस में तब्दील कर उसे उपयोगी बना दिया जाएगा इंदौर ने बीते पांच छह वर्षों में कचरे से कमाल करने दिशा में जो प्रयास किए हैं, यकीनन वो  किसी चमत्कार से कम नहीं है।

यह वही शहर है जिसके बाहर कचरे का ऐसा पहाड़ हुआ करता था, जिसके कारण आसपास के 20 से अधिक गांवों के रहवासियों की जिंदगी नरक होने लगी थी।
किंतु इसी शहर की जीवटता देखिए कि यह अब अपने प्रतिदिन निकलने वाले कचरे से न केवल सीएनजी में बदलने जा रहा है, बल्कि उसी गैस से यहां सिटी बसें चलेंगी।

इंदौर ने जिस जीवटता और योजना से 70 साल पुराने 15 लाख टन कचरे से महज 3 साल में मुक्ति पाई वैसे प्रयास अन्य शहरों में नजर क्यों नहीं आता यह सवाल बार-बार सामने आता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहरों को कचरे के पहाड़ से निजात पाने के लिए कई बार अपील कर चुके हैं, लेकिन कचरे को सोने बदलने और उसे आय का माध्यम बनाने के सफल प्रयोग के बाद भी छोटे और मझोले शहर तो दूर महानगरों में भी इस पर तेजी से कार्य शुरू नहीं हो सका।
कारण स्पष्ट है यह है कि अब तक इन शहरों ने न तो  स्वच्छता संस्कार बन सकी है ना व्यवहार में आ सकी है ।

शहरों के स्थानीय प्रशासन और नगरी निकाय को कमजोर इच्छाशक्ति स्वच्छता की राह में बड़ी बाधा है।

कचरे से बायो सीएनजी बनाकर इंदौर ईंधन के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए बढ़ आगे बढ़ चुका है।

पहले चरण में 400 बसें चला कर देश का सबसे  स्वच्छ शहर यह संदेश भी दे रहा है कि अन्य शहर भी ऐसे प्रयास शुरू कर दें तो वह दिन दूर नहीं जब ईंधन के लिए हमारी पेट्रोल डीजल पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी ।

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