बंगाल चुनाव और हिंदू विरोधी हिंसा

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बंगाल का जो नतीजा आया वह जाहिर तौर पर भाजपा को निराश कर सकता है | प्रदेश की सत्ता नहीं मिली | लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है | राजनैतिक रूप से बंजर जमीन में पार्टी का 25 गुना से ज्यादा विस्तार हो गया है | यह उत्साह भरने के लिए काफी है |

जिस तरह से हिंसा के वातावरण में भाजपा ने इतनी सीटें प्राप्त की है वो अपने आप में एक शानदार उपलब्धि है क्योंकि भाजपा हर मोर्चे पर झूझ रही है |

लेकिन इसके बाद जिस तरह से बंगाल में हिंसा का खूनी खेल हो रहा है वो किसी से छिपा नहीं है, चुन चुन कर हिंदुओं की निशाना बनाया जा रहा है और उन हिंदुओं को भी निशाना बनाया जा रहा है जो टीएमसी के समर्थक थे ।

इस हिंसा से पूरे देश में यह संदेश जाएगा कि यदि आपकी किसी पार्टी विशेष से विचारधारा नही बनती है तो आपको उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी, इससे काफी गलत संदेश जाएगा देश के बाकी राज्यों में।

इस हिंसा से उन सेक्युलर हिंदुओं को भी सबक मिल गया है जो शुरू से भाजपा और हिंदू विचारधारा के खिलाफ रहे थे शुरू से, इस चुनावी हिंसा से ममता बनर्जी के तानाशाह रूप भी सबसे सामने आ गया। जिन हिंदुओं ने एनआरसी और सीएए का विरोध किया था बंगाल मे आज उनको भी निशाना बनाया जा रहा है जिहादियों द्वारा, क्योंकि यही जिहादी ममता बनर्जी के कट्टर वोट बैंक है ।

जो मीडिया के कुछ लोग मोदी जी को कोसते थे कि मोदी जी के राज में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, वही मीडिया अब बंगाल हिंसा पर मौन साधे बैठा हुआ है।

एक तरफ देश में कोरोना की महामारी और दूसरी बंगाल में हिंसा में अपने कई कार्यकर्ताओ को खो देना, दलाल मीडिया द्वारा झूठ फैलाना, नकारात्मक खबरों का प्रचार करना | इन सबके बावजूद जिस तरह का प्रचार किया गया था  सोशल मीडिया पर भाजपा के खिलाफ उस हिसाब से बहुत सरहानीय प्रदर्शन किया गया है भाजपा द्वारा |   

जिस असम को कांग्रेस और कुछ विपक्षी दलों ने पिछले डेढ़ साल पहले मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन की धरती के रूप में पेश किया था, वहां जनता ने और ज्यादा समर्थन देकर वापस सत्ता में ला दिया |

असम में जिस तरह भाजपा सरकार ने सख्त कदम लिए जिसमे सबसे प्रमुख था राज्य के मदरसों को बंद करके उनको नियमित स्कूलो में परिवर्तित करना  असम सरकार का यह तर्क था कि कुरान का शिक्षण सरकारी धन पर नहीं हो सकता |

अगर हमें ऐसा करना है तो बाइबल और भगवद गीता दोनों को भी सिखाना चाहिए | इसलिए हम समानता चाहते है और इस प्रथा को रोकना चाहते है |

असम सरकार के इस फैसले से जहां कट्टरपंथी नाराज हो गए थे वहीं देश विरोधी ताकतों ने इसे अपने दुष्प्रचार के अजेंडे में शामिल कर लिया था | लेकिन उनकी कोई भी साजिश काम नहीं आ पाई और विधानसभा के चुनावो में भाजपा ने जीत दर्ज की |

दक्षिण के तीन राज्य तमिलनाडू, केरल, पुडुचेरी  यूँ तो भाजपा की रणनीति का केंद्र नहीं थे लेकिन भाजपा ने वहां पर भी बेहतर प्रदर्शन किया | इसका श्रेय जाहिर तौर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की मेहनत को जाता है |

चूंकि सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा चर्चा में बंगाल चुनाव रहा इसलिए वही से चर्चा की शुरुवात करते है | यह कहा जा सकता है कि भाजपा को वहां से 200 प्लस सीटों का दावा कर रही थी लेकिन सौं भी नहीं पहुंच पाई |

लेकिन क्या यह किसी से छिपा है कि भाजपा वहां सही मायने में सिर्फ 70- 75 फीसद सीटों पर चुनाव लड़ रही थी | बंगाल में तुष्टिकरण हमेशा से मुद्दा रहा है | ममता ने चुनाव में इसकी अपील भी की थी कि अल्पसंख्यक केवल तृणमूल को ही अपना वोट डाले |

प्रदेश में 28-30 फीसद अल्पसंखयक मतदाता है | पचास से ज्यादा ऐसी भी सीटें भी है जहां अल्पसंखयक मत ही हार जीत तय करते है | जिस बंगाल में पिछली बार सिर्फ तीन विधायक थे वहीँ अब भाजपा अब एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित हो गई है जहां से वह रोजाना ममता सरकार की उन्ही नीतियों को कठघरे में खड़ा कर सकती है जो चुनाव में मुद्दे बने थे |

यानी अगले पांच साल ममता को हर मोड़ पर प्रदेश के सभी वर्गों के लिए जवाबदेह बनना पड़ेगा और करके दिखाना भी होगा |

ये सभी मुद्दे इसलिए बहस के केंद्र में आए क्योंकि पीम मोदी , अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे शीर्ष नेताओ ने इसे जनता के सामने रखा और भरोसा दिलाया कि वह प्रदेश में समानता लाएंगे |

जो जीता वही सिकंदर का नारा तो सही है लेकिन राजनैतिक नजरिये से यह भाजपा ने उपलब्धि हासिल की | लगातार दूसरी बार बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाने के बावजूद भाजपा बल्कि राजग का राज्यसभा में भी बहुमत का भी आंकड़ा नहीं छू पाया है |

बंगाल में जो भाजपा ने छलांग लगाई है उसके कारण राज्यसभा में भी बहुमत तक पहुंचने का रास्ता आसान होगा | यानी केंद्र की मजबूती बढ़ेगी |

असम में भाजपा की जीत के खास अर्थ है | एनआरसी और सीएए के खिलाफ दिल्ली से  लेकर असम तक विपक्षी दलों का आंदोलन चला था | इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर मोदी जी को घेरने की कोशिश हुई थी |

दिल्ली के शाहीनबाग और असम को ऐसी प्रयोगशाला बनाया गया था जहां मानवता के आधार पर मोदी सरकार को घेरा जा सके |

विधानसभा चुनाव में राहुल गाँधी ने सीएएको रद्द करने की बात कही थी | लेकिन हुआ क्या | शाहीनबाग में षडयंत्र का सच तो बाहर आ चुका है |

असम ने जनता ने ही साफ़ कर दिया कि उन्हें एनआरसी और सीएए दोनों पसंद है | इस चुनाव का सबसे बड़ा यह सन्देश है |

उम्मीद की जानी चाहिए कि अब कम से कम कांग्रेस एनआरसी और सीएएको राजनीती में नहीं घसीटेगी | कांग्रेस यह समझेगी कि कुछ मुद्दे देश के होते है | एनआरसी वैसा ही मुद्दा है | ठीक उसी तरह जैसे 370 रद्द करना | ऐसे मुद्दों पर समर्थन देना देश के लिए भी हितकर होता है और राजनीती के लिए भी |

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