महाराणा प्रताप और हल्दी घाटी का युद्ध।

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#महाराणा 2

“हे खुमाण स्वरूप महाराणा! हे एकलिंग के दीवान! हे राजपूतकुल भूषण! तब कल के युद्ध के विषय में आपका क्या आदेश है…”

एक राजपूत वीर ने महाराणा से पूछा! उस समय महाराणा का तेज ग्रीष्म के सूर्य का समान था!उस तेज के सामने भला कौन टिक सकता था!

महाराणा ने तलवार उठाई और कहा….”मेरा नाम प्रताप है! साक्षात रुद्र और रणचंडी मेरा नाम सुनकर प्रसन्न हो जाते हैं! कल सूर्योदय होते ही मैं स्वयं युद्ध के मध्यभाग से संचालन करता हुआ, शाही सेना को नष्ट करता हुआ सभी आमिषाहारियों को आमिष से तृप्त कर दूंगा! उन्मत गज समूह के दाँत उखाड़कर धरा पर पछाड़ दूंगा! हल्दीघाटी की समस्त धरती को रुंड मुंड मय कर दूंगा!”

“मैं भवानी के समस्त वीरों के साथ मिलकर मलेच्छ पक्ष के शत्रुओं को धराशायी कर हल्दीघाटी के युद्धस्थल को यज्ञ कुंड बना दूंगा! वहां चामुंडा नृत्य करेगी!”

“मैं प्रातः होते ही सक्रोध युद्ध क्रीड़ा में रत्त हो जाऊंगा और महाभारत युद्ध में जिस प्रकार अर्जुन ने ख्याति प्राप्त की थी, उसी प्रकार की ख्याति मैं भी प्राप्त करूंगा!”

महाराणा पूरे आवेश में कहते जा रहे थे और उनका एक एक शब्द जैसे लौह भट्टी में तपे हुए लौह की तरह वहां उपस्थित समस्त वीरों के शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ाए जा रहा था!

“कल मैं चेतक पर सवार होकर सेना के मध्य भाग से संचालन करूंगा! हकीम खान सूरी आदि वीर योद्धा मेरे दाएं बाएं की पंक्तियों के नेतृत्व संभालेंगे और हम सब समरभूमि में या तो विजय श्री का वरण करेंगे, अथवा सदैव के लिए अमर हो जाएंगे! अमिट हो जाएंगे!”

“वह दुष्ट मानसिंह कल बचना नहीं चाहिए! समस्त मलेच्छों का मर्दन हो जाना चाहिए और उस दुष्ट तुर्क को ऐसा सबक सिखाया जाना चाहिए कि वह पुनः राजपूताने की तरफ आंख उठाकर देखने योग्य न बचे!”

” भवानी के वीरों शस्त्र उठाओ!बलिदान देने को सज्ज हो जाओ! यही समय की मांग है!जय एकलिंग!”

और उसके बाद “जय भवानी….”….”जय एकलिंग” …..और “हर हर महादेव” के नारों से वह समूचा मन्त्रणा कक्ष गूंज उठा!

और अगली प्रातः को #हल्दीघाटी में जो कुछ हुआ और महाराणा के साथ साथ हजारों प्रताप हल्दीघाटी में जिस शूरता, जिस वीरता और बलिदान के साथ लड़े, वह अपने आप में इतिहास है!

#संदर्भ…”राणा रासौ” की कुछ पंक्तियां…और शेष मेरी कल्पना मिश्रित शब्द!

#आशीष #शाही

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