रामशेज : हिंदवी स्वराज्य वह किला जिसे हासिल करने का औरंगजेब का सपना सपना कभी पूरा ना हो सका।

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“रामसेज”…..यह नाम सन 1682 से 1688 तक औरंगजेब और मुगलों में भय का प्रतीक बन चुका था, क्योंकि रामसेज का किला, हिंदवी स्वराज्य का सबसे छोटा किला होते हुए भी और मात्र 600 मराठा सैनिकों की पहरेदारी में रहते हुए भी औरंगजेब से छः साल तक जीता नहीं जा सका था!

महाराष्ट्र, नासिक से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान है, जिसका नाम है “रामशेज”! यह नाम इसलिए क्योंकि कहा जाता है त्रेता में भगवान श्रीराम यहां आए थे और विश्राम किया था! इसी जगह पर उनकी “सेज” थी, इसलिए इस स्थान का नाम “रामसेज” पड़ गया!

पौराणिक के साथ साथ इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व भी उतना ही है, जिसे जानकर सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है!

यह वह किला था, जिसने लगातार छह सालो तक मुगलों को टक्कर दी और इतनी बड़ी सेना, इतना बड़ा संख्याबल होते हुए भी मुगल मात्र 600 मराठो से बार बार हारते रहे!

यह किला बेहद छोटा और रणनीती के लिए इतना महत्वपूर्ण भी नहीं हुआ करता था, लेकिन जब औरंगजेब ने मराठा साम्राज्य (स्वराज्य) पर हमला किया तो उस दौर में इस किले को काफी अहमियत मिली!

छत्रपती शिवाजी महाराज के देहांत के बाद औरंगजेब ने दख्खन को काबीज करने की ठान ली और शुरूआत स्वराज्य से करी! 1682 वो साल था जब औरंगजेब ने स्वराज्य पर जीत हासिल करने के लिए अपने बडे बडे खूंखार और सुरमा सरदारो के साथ मिलकर हमले की योजना बनाई!

“पहली जीत से हौसला बुलन्द होता है!” यह औरंगजेब भली भाती जानता था, इसलिए वह चाहता था कि पहले हमले में जीत जल्द से जल्द मिले, ताकि उसकी सेना का मनोबल और बढे! औरंगजेब ने स्वराज्य की कमजोर कडी पर वार करने की सोची!

कमजोर कडी का अर्थ है कमजोर और छोटे किले क्योकि स्वराज्य की जान किलो में ही बसती थी!

उन कमजोर किलो में सबसे आगे नाम आया रामसेज का!बेहद छोटा कम ऊंचाई पर बसने वाले इस किले पर सैनिकों की संख्या सिर्फ 600 थी और तो और किलेदार भी बूढ़े #सूर्याजी जेधे थे! इसलिए जल्द से जल्द जीत हासिल करने के लिए रामसेज का किला सबसे अच्छा था!

छत्रपति सम्भाजी ने इस किले का किलेदार बनाया था वीर #सूर्याजी #जेधे को!

औरंगजेब ने अपने सबसे #खूंखार सरदारों मे से एक #शहाबुद्दीन #खान को रामसेज पर चढाई के लिए भेज दिया! साथ मे दस हजार का सैन्य बल, हाथी,घोडे और तोप भी दिए! शहाबुद्दीन खान और औरंगजेब को लगा कि एक-दो दिन में ही किला काबीज हो जायेगा और ऐसा लगना जायज भी था क्योंकि दस हजार के सैन्य बल और बड़ी बड़ी तोपों के आगे छह सौ मावले कहातक टिक पाते?पर मुगलों का यह वहम जल्द ही टुटने वाला था!

साल 1682 में शहाबुद्दीन खान ने रामसेज पर हमला कर दिया!हमला करते ही उसका किला जल्द काबीज करने का वहम भी टुट गया! उसके एक-दो दिन, दो सालों मे बदल गये पर उसे जीत हासिल नहीं हो पायी!

जब भी मुगल सेना हमले के लिए आगे बढती तब किले के पास आते ही सूर्याजी के नेतृत्व में मराठे उनपर पत्थरों की बौछार कर देते! मुगलों का सिर कुचल जाता! इस तरह कई मुगल सैनिक पत्थरबाजी मे मारे गये! मराठा मावलो ने मुगल सेना को कभी भी किले के पास तक आने नहीं दिया! कुछ महीनों बाद शहाबुद्दीन ने जाना की ऐसे तो कुछ होने वाला नहीं है, तब उसने किले पर तोपें दाग दी!

“अब तो किला हाथ में आना ही चाहिए” शहाबुद्दीन ने सोचा
, लेकिन मराठे पिछे हटने वालों में से नहीं थे! जब भी तोपों से किले की दीवार गिरती तब तब मराठे रातोरात वो दीवार फिर से बना लेते!

सूर्याजी जेधे, लगभग साठ वर्ष की उम्र में भी दिनरात जागकर किले की पहरेदारी करते और मराठों को उनके कर्तव्यों का आभान करवाते!

सूर्याजी आराम कब करते हैं, अथवा सोते कब हैं, इसका किसी को पता नहीं था!

दो दिनों के दो साल हो गये!दस हजार की सेना,तोप, गोले,हाथियों के होते हुए भी शहाबुद्दीन के सैनिक और अधिकारी मारे जा रहे थे! फिर भी मुगल सेना किले के पास तक नहीं जा पायी! इसलिए औरंगजेब शहाबुद्दीन खान पर बहुत नाराज हुआ और उसे वापस बुला लिया!

पर फिर एक बार शहाबुद्दीन खान को मौका दिया गया! इसी बीच किले पर तैनात मराठो ने इतिहास मे पहली बार लकड़ी की तोपें बनायीं और उसके लिए काफी सारे गोले शहाबुद्दीन की सेना से ही लुट लाये! और इसी बीच मराठो की सेना की कई टुकड़ियां मुगल सेना पर कई बार हमला करके भाग जाया करती थी और उपर से मुगलों को मिलने वाली रसद मराठे बीच रास्ते में ही लूट लेते थे!

शहाबुद्दीन खान से कुछ भी नहीं हो पा रही था!ये देखकर औरंगजेब ने अपने सौतेले भाई बहादुर खान (खानजहाँ बहादुर) को शहाबुद्दीन खान की मदद के लिये भेज दिया और सिलसिला शुरू हुआ; औरंगजेब का एक एक सुरमा सरदार रामसेज जितने के लिए आता गया और खाली हाथ वापस लौटता गया!

फिर कहीं से मुगल सेना मे ये अफवाह फैल गई कि “#किले #की #रक्षा #मराठो #के #भूत #कर #रहे #हैं!” ये खबर मुगल कोकलताश को मिली!

अब बर्बादी का आलम यह था कि मुगल सरदारों ने भी इसपर विश्वास कर लिया! भूत को भगाने के लिये मांत्रिक को लाया गया! मांत्रिक ने सौ तोले सोने के साप की मांग की!ये मांग पुरी की गयी! मांत्रिक ने कहा कि “इस साप को लेकर मैं आगे चलुंगा और मुगल सेना मेरे पिछे पिछे आयेगी, किले का दरवाजा अपने आप खुल जाएगा!”

पर चढाई करने के बाद जैसे ही मुगल सेना किले के पास पहुँची मराठो ने जोरो शोरो से पत्थरबाजी करना शुरू कर दिया! मुगल सेना जैसे उपर आयी थी वैसे ही वापस भाग खडी हुई! फिर मुगल सरदारों ने लकड़ी का दमदमा खडा करके उसपे से तोपें दागने की कोशिश की लेकिन मराठो ने वो दमदमा ही जला दिया!

औरंगजेब को जब भूतों वाली बात पता चली तो उसने अपना सिर पीट लिया! उसने मराठों से मात खाए अपने सरदारों को खूब बुरा भला सुनाया!

छः साल बीतने पर भी रामसेज जैसा छोटा किला हाथ नहीं आ रहा था, आलमगीर औरंगजेब के लिए इससे बड़ी बेइज्जती और क्या हो सकती थी!

आखिरकार असहाय होकर औरंगजेब ने अपनी सेना को पिछे हटा लिया,और रामसेज को काबीज करने का खयाल ही छोड दिया!

मराठो के सबसे कमजोर किलो में से एक किला भी औरंगजेब जीत नहीं पाया!

छः साल तक एक छोटा सा किला और मात्र 600 मावले सैनिक, मुगलों को मुंह चिढ़ाते रहे और उनपर पराजय की कालिख पोतते रहे!

रामसेज छः सालों तक अजिंक्य बना रहा! अपराजेय बना रहा! मुगलों को मराठों, सूर्याजी जेधे और सम्भाजी का लोहा मानना ही पड़ा!

म्लेच्छ कुल में जन्मे मुगल आखिर उस पवित्र किले को जीत भी कैसे सकते थे, जो स्वयं भगवान श्री राम की विश्रामस्थली रहा हो!

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