महाशिवरात्र्याम् विशेषं ! येन कारणेन मान्यते महाशिवरात्रि, अभवत् स्म इदम् घटनाम् !महाशिवरात्रि पर विशेष ! इसलिए मनाई जाती है महाशिवरात्रि,हुई थी यह घटना !

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शिवरात्रि तदा प्रत्येक मासे आगच्छति तु महाशिवरात्रि संपूर्ण वर्षे एकदा आगच्छति ! फाल्गुन मासस्य कृष्ण पक्षस्य चतुर्दशिम् महाशिवरात्र्या: उत्सवम् मान्यते ! अस्यदा वर्ष २०२१ तमे इदम् पर्व ११ मार्च गुरूवासरमस्ति अर्थतः अद्यास्ति !

शिवरात्रि तो हर महीने में आती है लेकिन महाशिवरात्रि साल भर में एक बार आती है ! फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है ! इस बार साल 2021 में यह पर्व 11 मार्च वृहस्पतिवार को है अर्थात आज है !

महाशिवरात्र्या: महत्वम् येन कारणमस्ति कुत्रचित इयम् शिवस्य शक्त्या: च् मेलनस्य रात्र्यास्ति ! आध्यत्मिक रूपेण येन प्रकृत्या: पुरुषस्य च् मेलनस्य रात्र्या: रूपे बद्यते ! शिव भक्त: अस्य दिवसं व्रतं धृत्वा स्वाराध्यस्याशीषम् लब्धन्ति !

महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए है क्योंकि यह शिव और शक्ति की मिलन की रात है ! आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात के रूप में बताया जाता है ! शिवभक्त इस दिन व्रत रखकर अपने आराध्य का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं !

मंदिरेषु जलाभिषेकस्य कार्यक्रम संपूर्ण दिवसं चरति ! तु किं भवताम् ज्ञातमस्ति तत महाशिवरात्रि किं मान्यते, अस्य पश्चस्य घटनाम् कास्ति !

मंदिरों में जलाभिषेक का कार्यक्रम दिन भर चलता है ! लेकिन क्या आपको पता है कि महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है,इसके पीछे की घटना क्या है !

पौराणिक कथानकानामानुसारं,महाशिवरात्र्या: दिवसं शिव महाशयः प्रथमदा प्रकटित: स्म ! शिवस्य प्रकाट्य ज्योतिर्लिंग अर्थतः अनलस्य शिवलिंगस्य रूपे आसीत् ! इदृशं शिवलिंग यस्य न तदा आद्यासीत् न अंतम् !

पौराणिक कथाओं के अनुसार,महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे ! शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था ! ऐसा शिवलिंग जिसका ना तो आदि था और न अंत !

ज्ञापयते तत शिवलिंगस्य ज्ञाताय ब्रह्मा महाभाग हंसस्य रूपे शिवलिंगस्य सर्वात् उपरि अंशम् दर्शस्य प्रयत्नम् करोति स्म,तु सः साफल्यं न लब्धितः !

बताया जाता है कि शिवलिंग का पता लगाने के लिए ब्रह्माजी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वह सफल नहीं हो पाए !

सः शिवलिंगस्य सर्वात् उपरि अंशमेव न प्राप्तैव ! द्वितीयं प्रति भगवतः विष्णु: अपि वराहस्य रूपम् गृहित्वा शिवलिंगस्याधारं अन्वेषणति स्म तु तेनाप्याधारं न लब्ध: !

वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए ! दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला !

एकमन्य कथानकमेदमप्यास्ति तत महाशिवरात्र्या: दिवसमेव शिवलिंग विभिन्न ६४ स्थानेषु प्रकटितम् स्म ! तेषु मया केवलं द्वादश स्थानस्य नामम् ज्ञातमस्ति ! येन वयं द्वादश ज्योतिर्लिंगस्य नाम्ना ज्ञायाम: !

एक और कथा यह भी है कि महाशिवरात्रि के दिन ही शिवलिंग विभिन्न 64 जगहों पर प्रकट हुए थे ! उनमें हमें केवल 12 जगह का नाम पता है ! इन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंग के नाम से जानते हैं !

महाशिवरात्र्या: दिवसं उज्जैनस्य महाकालेश्वर मंदिरे जनाः दीपस्तंभ स्थापयन्ति ! दीपस्तंभ येन कारणम् स्थापयन्ति कुत्रचित जनाः शिव महाभागस्य अग्नियुक्त अनंत लिंगस्य अनुभवं कर्तुम् शक्नुताः ! इदम् यत् मूर्त्यास्ति तस्य नाम लिंगोभव,अर्थतः यत् लिंगेण प्रकटितं स्म ! इदृशं लिंग यस्य न तदा आद्यासीत् नैव अंतम् च् !

महाशिवरात्रि के दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में लोग दीपस्तंभ लगाते हैं ! दीपस्तंभ इसलिए लगाते हैं ताकि लोग शिवजी के अग्नि वाले अनंत लिंग का अनुभव कर सकें ! यह जो मूर्ति है उसका नाम लिंगोभव, यानी जो लिंग से प्रकट हुए थे ! ऐसा लिंग जिसकी न तो आदि था और न ही अंत !

महाशिवरात्रिम् संपूर्ण रात्रि शिवभक्ता: स्वाराध्यं जागरणं कुर्वन्ति ! शिवभक्ता: अस्य दिवसं शिव महाभागस्य पाणिग्रहणस्य उत्सवम् मान्यन्ति ! मान्यतामस्ति तत महाशिवरात्रिम् शिव महाभागेन सह शक्त्या: पाणिग्रहणं अभवत् स्म !

महाशिवरात्रि को पूरी रात शिवभक्त अपने आराध्य जागरण करते हैं ! शिवभक्त इस दिन शिवजी की शादी का उत्सव मनाते हैं ! मान्यता है कि महाशिवरात्रि को शिवजी के साथ शक्ति की शादी हुई थी !

अस्यैव दिवसं शिव महाभाग: वैराग्य जीवनम् त्यक्त्वा गृहस्थ जीवने प्रवेशित: स्म ! शिव: यत् वैराग्यासीत्,सः गृहस्थ: अभवत् ! मान्यते,तत शिवरात्र्या: १५ दिवसानि पश्चात होलिकायाः उत्सवम् मान्यस्य पश्च एकम् कारणम् इदम् अप्यास्ति !

इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था ! शिव जो वैरागी थी,वह गृहस्थ बन गए ! माना जाता है, कि शिवरात्रि के 15 दिन पश्चात होली का त्योहार मनाने के पीछे एक कारण यह भी है !

कथ्यते तत समुद्र मंथनात् निःसृतम् गरलस्य पानम् कृत्वा भगवतः शिवः अस्य सृष्टिम् संकटेन रक्षितः स्म,अस्य कारणेन महाशिवरात्रि मान्यते ! सागर मंथनात् निःसृतम् गरलस्य पान कृतेन भगवतः शिवस्य कंठम् सितेतर भवितः स्म,येन कारणं तं नीलकंठमपि कथ्यते !

कहा जाता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान करके भगवान शिव ने इस सृष्टि को संकट से बचाया था,इस वजह से महाशिवरात्रि मनाई जाती है ! सागर मंथन से निकले विष का पान करने से भगवान शिव का गला नीला पड़ गया था,जिस कारण उनको नीलकंठ भी कहा जाता है !

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