कांग्रेस का क्षरण क्यों?

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आखिर देश के सबसे पुराने दल- कांग्रेस की दुर्गति का जिम्मेदार कौन है? कई विशेषज्ञों ने और अब स्वयं पार्टी के भीतर- विशेषकर जी-23 समूह की ओर से यह स्वर प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जोर पकड़ना लगा है कि कांग्रेस की वर्तमान दुर्दशा के लिए गांधी परिवार उत्तरदायी है। यह निष्कर्ष सच तो है, किंतु पूरा नहीं। क्या इस संदर्भ में केवल गांधी परिवार को ही दोषारोपित करना उचित होगा? यह ठीक है कि पार्टी में विश्वसनीय नेतृत्व का उन्मत्त आभाव है। कांग्रेस में अभी नेतृत्व क्षमता केवल उतनी है, जितनी गांधी परिवार के पास योग्यता है, जिनकी मानसिकता देशज नहीं है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार के बाद सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनीं हुई है, जोकि हाल के कुछ वर्षों से अस्वस्थ हैं। अक्सर, विदेशों में छुट्टियां बिताने वाले राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन होना अपना ‘विशेषाधिकार’ समझते है और उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का मतप्रतिशत और सीटें- दोनों ही सिकुड़ गए।

देश में संकीर्ण परिवारवादी राजनीति का रोग कांग्रेस की देन है, जिसकी जड़े स्वतंत्र भारत में पंडित जवाहरलाल नेहरू के कालखंड में मिलती है। 75 वर्षों से एक-दो अपवादों को छोड़कर कांग्रेस में शत-प्रतिशत एक ही परिवार का नेतृत्व रहा है, किंतु पिछले ढाई दशकों में ऐसा क्या हुआ कि यह पार्टी ‘इतिहास बनने’ की ओर अग्रसर है? क्या केवल नेतृत्व परिवर्तन भर से कांग्रेस का कालाकल्प संभव है?

वर्ष 1968-73 के कालखंड में देशभर के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 41 प्रतिशत मतप्रतिशत प्राप्त हुआ था, जो वर्ष 2016-20 और वर्ष 2021-22 में घटकर क्रमश: 23 प्रतिशत और 18 प्रतिशत हो गया। इन 50 वर्षों में जिन प्रदेशों में राजनीतिक ह्रास के बाद कांग्रेस तीसरे स्थान पर या उससे भी नीचे खिसकी, वहां वह कभी उभर ही नहीं पाई। दिल्ली इसका सबसे बड़ा व एक और हालिया उदाहरण है, जहां 15 वर्ष (1998-2013) लगातार शासन करने के बाद कांग्रेस 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल पाई है। देश में अभी कांग्रेस के केवल दो प्रत्यक्ष मुख्यमंत्री- राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, तो राज्यसभा में पार्टी के 34 सांसद है।

प्रारंभ में कांग्रेस एक ऐसा छाता था, जहां हर प्रकार की विचारधारा को मानने वालों के लिए स्थान था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महामना मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और गांधीजी- यह सभी भारत की सनातन संस्कृति से प्रेरणा पाते थे। गांधीजी की नृशंस हत्या के बाद जब कांग्रेस पर पं.नेहरू का एकाधिकार हुआ, तो पार्टी का मूल सनातनी और बहुलतावादी चरित्र को धीरे-धीरे हाशिए पर ढकेल दिया गया। इसमें रही सही कसर इंदिरा गांधी ने पूरी कर दी। वर्ष 1969 में जब कांग्रेस दो फाड़ हुई और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार अल्पमत में आई, तब संसद में उन्हें अपनी सरकार बचाने हेतु 41 सांसदों की आवश्यकता थी और इस कमी को वामपंथियों ने बाहरी समर्थन देकर पूरा किया। इंदिरा ने उन कम्युनिस्टों की बैसाखी से अपनी सरकार बचाई, जिनका उद्भवकाल से एकमात्र एजेंडा- भारत की सनातन संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली को नष्ट करना है। अपने इसी दर्शन के कारण वामपंथियों ने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में ब्रितानियों के लिए मुखबिरी की। गांधीजी, नेताजी आदि देशभक्तों को अपशब्द कहे। पाकिस्तान के जन्म में मुस्लिम लीग और अंग्रेजों के साथ मिलकर महती भूमिका निभाई। भारतीय स्वतंत्रता को अस्वीकार करके उसे 17 देशों का समूह माना। 1948 में भारतीय सेना के खिलाफ हैदराबाद के जिहादी रजाकरों के साथ, तो 1962 के भारत-चीन युद्ध में वैचारिक समानता के कारण चीन के पक्ष में खड़े रहे। इसके अतिरिक्त, 1967 में लोकतंत्र विरोधी नक्सलवाद को जन्म दिया। जब 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया, तब कई विशुद्ध वामपंथी न केवल कांग्रेस में शामिल हुए, साथ ही उन्हें शिक्षा विभाग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों को पदभार भी सौंप दिया। इसी दौर में कांग्रेस ने अपनी मूल गांधीवादी विचारधारा को वामपंथियों को ‘आउटसोर्स’ कर दिया, जो अब भी उससे सांप की केंचुली की भांति चिपकी हुई है। कांग्रेस का सार्वजनिक-व्यवहार उन घिसे-पीटे वामपंथी व्याकरण से निर्धारित हो रहा है, जिसमें उसका भी कोई दृढ़-विश्वास नहीं है। कांग्रेस ऐसा केवल इसलिए करने को विवश है, क्योंकि विचारधारा के मामले में वह पहले ही शून्य हो चुकी है।

मैकॉले चश्मा पहनी कांग्रेस जाने-अनजाने में तभी से वामपंथियों के साथ मुस्लिम लीग के अधूरे सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। वह चाहे अधिनायकवादी मानसिकता के साथ 1975-77 में देश पर आपातकाल थोपना हो, 1985-86 शाहबानो मामले के रूप में मुस्लिम समाज में सुधार के प्रयासों को रोकना हो, 1998 के पोखरण-2 परमाणु परीक्षण का विरोध करना हो, 2007 में मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम को काल्पनिक बताना हो, 2005-2011 के बीच केवल हिंदुओं को लक्षित करते ‘सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण अधिनियम’ को संसद में पारित करवाने का प्रयास हो, 2016 में जेएनयू परिसर में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे…’ जैसे नारों का समर्थन करना हो, भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक पर संदेह जताना हो, भारतीय जीवनशैली हिंदुत्व को कलंकित करना हो, आतंकवादियों और अलगाववादियों से सहानुभूति रखनी हो या फिर स्कूलों में मुस्लिम छात्राओं द्वारा हिजाब/बुर्का पहनने की मांग का समर्थन करना हो- ऐसे दर्जनों उदाहरण है।

अब यदि कांग्रेस के सिकुड़ते जनाधार के लिए केवल गांधी परिवार ही जिम्मेदार है- तो क्या यह सत्य नहीं कि वामपंथी एजेंडे के अनुरूप मिथक ‘हिंदू/भगवा आतंकवाद’ का हौव्वा कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह, पी.चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे आदि ने खड़ा किया था? क्या सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान राम मंदिर के खिलाफ पैरवी करने वालों में कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल शामिल नहीं थे? क्या स्वदेशी कोविड-19 रोधी टीके की दक्षता पर सवाल उठाने वालों में शशि थरूर, मनीष तिवारी आदि कांग्रेसी नेता अग्रणी नहीं थे? फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ का विरोध करते हुए 1989-91 में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को ‘झूठा’, ‘प्रोपेगेंडा’ और हत्याओं के आंकड़े को ‘फर्जी’ बताने की शुरूआत क्या कांग्रेस की केरल ईकाई ने नहीं की थी?

मई 2014 में मिली मिली करारी हार के बाद कांग्रेस द्वारा स्थापित ए.के.एंटनी समिति ने भी माना था कि पार्टी की छवि हिंदू विरोधी हो गई है। इसके बाद अधूरे मन से कांग्रेस ने अपनी इस गलती का सुधार बहुत ही भोंडेपन के साथ किया। जब केवल चुनाव के समय ही पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी कुर्ते के ऊपर जनेऊ पहनकर मंदिर-मंदिर घूमकर स्वयं को सच्चा हिंदू स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे, तब उनके कार्यकर्ताओं ने केरल की सड़क पर मोदी विरोध के नाम पर और अपने ‘सेकुलरवाद’ को सत्यापित करने के लिए सरेआम गाय के बछड़े को मारकर उसका मांस का सेवन किया था। स्वाभाविक है कि इससे पार्टी को न ही कोई वांछनीय फल मिला और न ही जनमानस प्रभावित हुआ।

चिंतन के मामले में कांग्रेस, वामपंथियों की एक घटिया कार्बन कॉपी बनकर रह गई है। कांग्रेस तभी पुनर्जीवित हो सकती है, जब वे संकीर्ण परिवारवाद के वायुमंडल से बाहर निकले और वामपंथ व उसके ‘अर्बन नक्सल’ संस्करण से मुक्ति पाए। क्या वर्तमान समय ऐसा होना संभव है?

श्री बलबीर पुंज द्वारा लिखित यह लेख सर्वप्रथम दैनिक जागरण के 30 मार्च के अंक में प्रकाशित हुआ है

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