द्रविड़वाद का इतिहास – एक झलक और कड़वाहट

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Ancient Indian Warriors | Pic Credit: A.Davey Wikimedia
Ancient Indian Warriors | Pic Credit: A.Davey Wikimedia

मैंने पिछला महीना पूर्णतः भारतीय इतिहास एवं भारतीय संस्कृति का अध्ययन का प्रयास किया।

मैंने भारतीय वेदांग ज्योतिष से लेकर आधुनिक भारतीय जन-समाज को और जाना।

भारत को सोने की चिड़िया के रूप में विश्व विख्यात विराट सांस्कृतिक शक्ति से लेकर मात्र एक सेक्युलर देश जो मध्यमता को बढ़ावा देती है।

मेरी मन उस ओर गया जब अंग्रेज़ो का राज था।

भारतीय संस्कृति को समझने पश्चिम से बहुत व्यक्ति आ रहे थे। उनमें से एक, विलियम जोन्स नामक एक व्यक्ति आया और 1799 में अपने यूरोपीय सहचरियों को लिखा :

संस्कृत भाषा…की वाक्य संरचना अद्भुत है; यूनानी से अधिक सटीक, लैटिन से अधिक बिपुल, और परिष्कार में दोनों से अधिक सूक्षम फिर भी दोनों से इसकी इतनी गहरी समानता है ..जितनी संयोग मात्र से संभव नहीं हो सकती।

यह व्याख्यान श्री राजीव मल्होत्रा की पुस्तक ”भारत विखण्डन” (Breaking India) से ली गई है
यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है क्योंकि यहाँ से भारत को समझने के लिए लोगों का आना जाना हुआ और उससे भी ज्यादा यहूदी-ईसाई ढांचे से बचने के लिए यूरोपीय रोमांटिसिस्ट एक ऐतिहासिक आधार की खोज में निकल पड़े।

भारत के अति विशाल संस्कृति को देख ऐसे लोगों को अपना उल्लू सीधा कारण का मौका मिला।

भारत में यहूदी ईसाईवाद का षडयंत्र

ऐसा देखा गया है कि जहाँ पर उपनिवेशी देशों ने राज किया, वहाँ पर पहचानको लेकर दंगे हुए।

ये अफ्रीका में सबसे अधिक देखा गया जहाँ आज भी वाद-विवाद चले जा रहे है।

भारत में इसे उत्तर बनाम दक्षिण बना दिया गया।

”नस्लवादी विज्ञान” के जरिए भारतीयों को तोड़ने का प्रयास किया गया।

उत्तर भारतीयों को आर्य में और दक्षिण भारतीयों को द्रविड़ में और इस चीज़ को अंग्रेजों ने नवीन शिक्षा प्रणाली का एक हिस्सा बना दिया।

आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ प्रवित्ति का व्यक्ति. श्रेष्ठ तो कोई भी हो सकता है! यह कथन कदापि सत्य नहीं कि एक क्षेत्र की जनसँख्या अश्रेष्ठ है।

बहरहाल, द्रविड़ शब्द का कथन श्रीमद भागवतपुराण और मनुस्मृति जैसे श्रुति और स्मृति में है।

दक्षिण भारत के ब्राह्मणों का वर्णन द्रविड़ से किया गया, जबकि उत्तर के ब्राह्मणों को गौड़िया से किया गया।

तो यह विभाजन का प्रयास इतना बड़ा और भारत विखंडनीय ताकतों का सह – उद्देश्य कैसे बन गया?

भाषाओं का विभाजन

इन विभाजनवादी तत्वों में बहुत पुरुषों का नाम सामने आता है। परन्तु उनमें से एक सर्वाधिक हैं। रॉबर्ट काल्डवेल नामक एक ईसाई मिशनरी भारत को सनातन धर्म बहुल क्षेत्र से ईसाई बहुल बनाना चाहता था।

1816 में अलेक्जेंडर कैंपबेल और तत्कालीन मद्रास (अब चेन्नई) के कलेक्टर, फ्रांसिस वाइट एलिस के दुष्ट बुद्धि ने पहले तमिल भाषा और बाद में शेष दक्षिण भारतीय भाषाओं को भारत से अलग बताया। उनका तर्क था कि उन्हें ऐसा लगा कि दक्षिणी भाषाएं भारतीय हैं ही नहीं!

दुर्भाग्यसे, एलिस की फोर्ट सैंट जॉर्ज के वक्ताओं के साथ ऊंची पहुंच थी। उस समय वह विश्वविद्यालय विदासी शिक्षा देने में प्रबल था जिससे नए प्रशासनिक बाबूलोग आते थे।

कुल मिलाकर एलिस व कैंपबेल ने अपनी पुस्तक छपवाई, “तेलुगू भाषा की व्याकरण” (Grammar of the Teloogoo Language), जिसमें उन्होंने तमिल व तेलुगू को संस्कृत की उत्पत्ति ही नकार दी।

कारण? विलियम जोन्स के कथन को आगे बढ़ाते हुए, यह कहा कि तमिल व तेलुगू शायद अरबी या हिब्रू के संबंधी हैं!

तर्क? जी तर्क उन्होंने बाइबल से दिया।

यह मिथ्या आगे चलकर और पारिहासिक हो जाती है।

1840 के दशक में रेवरेंड जॉन स्टीवेंसन और ब्रायन हॉजसन ने यह बात रखी कि तमिल संस्कृत से पुरानी भाषा, भारत की एक एबोरिजिनल भाषा है।

दुर्भाग्य की बात है कि आज भी इस मन गढंत विचारों को आज भी भारत के शासन तथा शिक्षा व्यवस्था में आज भी फल-फूल रहीं हैं।

काल्डवेल तिरुनवेली का बिशप बना और उतना ही शक्तिशाली बना।

और इस विपरीत बुद्धि ने 1881 में “तिन्नेवली डिस्ट्रिक्ट का राजनैतिक और सामान्य इतिहास” नामक पुस्तक लिखी।

इस पुस्तक ने पूर्णतः भारत का सामाजिक मौसम को हिला के रख दिया।

आज का भारत की दुर्दशा

क्योंकि भारत के शासनिक ढाँचा ज्यों का त्यों अंग्रेजी है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि दक्षिण भारत की राजनीति में द्रविड़वाद कूट कूटकर भरी है।

जब हिंदी को राजभाषा बनाया जा रहा था तो पहले तमिल नाडु में और फिर दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी आंदोलन हुए।

इसका आगमन पेरियार के साथ शरू हुई जिसमें यह तर्क दिया गया कि हिंदी बलपूर्वक तमिल नाडु में लगा दी जाएगी व तमिल नाडु का जन समाज पूर्णतः उत्तरी भारत के दासत्व में आ जाएगी।

लोग पेरियार की बात में आ गए।

और बाकी हम सब जानते ही हैं।

कुछ विचार

भारत एक विराट देश के साथ-साथ एक उपमहाद्वीप भी है।

जिस तरह यूरोपीय संघ में सारी यूरोपीय भाषाएँ मान्य है, भारत में सारी भाषाएँ का सम्मान करना चाहिए।

क्योंकि भारत में आज अंगेज़ी को एक अलग, औपनिवेशिक दृष्टि से देखा जाता है।

यद्यपि भारत को श्रेष्ठ बनना है तो शासन को बढ़ावा देना पड़ेगा, अन्यथा भारत एक पिछलग्गू बनकर रह जाएगा।

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