आर्मेनिया – अजरबैजान युद्ध: ड्रोन (मानव रहित विमान) युद्ध

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Armenia Azerbaijan Conflict | Pic Credit: Wikimedia
Armenia Azerbaijan Conflict | Pic Credit: Wikimedia

आर्मेनिया – अजरबैजान युद्ध का नतीजा ड्रोन / यू ए वी (मानव रहित विमान) द्वारा तय किया गया है । अजरबैजान ने इजरायल और तुर्की के ड्रोन ख़रीदे थे । तुर्की का ड्रोन कनाडा के इंजन पर आधारित है, और अब कनाडा ने तुर्की को अपनी तकनीक देने से मन कर दिया है ।

अर्मेनियाई टैंकों, राडार, सैनिकों, वाहनों, आदि पर एक अज़रबैजान ड्रोन हमले के सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर बहुत सारे वीडियो उपलब्ध हैं । आर्मेनिया के सेना को पता भी नहीं चला, कि उन पर क्या हमला हुआ । वो बस बेबस हो कर अपने ऊपर हमले होते देखते रहे, और अगर वो ड्रोन को मार भी गिराते थे, तो बस स्टील का एक कचरा गिरता था, और अजरबैजान का कोई जानी नुकसान नहीं होता था । आर्मेनिया जैसे छोटे देश (जिसकी आबादी केवल 30 लाख है), के पास उच्च तकनीक वाले ड्रोन के खिलाफ कोई मौका नहीं था ।

असहाय आर्मेनिया की मदद के लिए कोई देश आगे नहीं आया । इस लड़ाई में आर्मेनिया का नुकसान अज़रबैजान की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक हैं । आर्मेनिया मुख्य रूप से ड्रोन के कारण युद्ध हार गया । अर्मेनिया ने 25-30 साल पहले के युद्ध में अजरबैजान को हराया था, और इस बार भी वह युद्ध के लिए अच्छी तरह से तैयार था। लेकिन ड्रोन ने युद्ध बदल दिया और किसी किसी मोर्चे पर तो बिना एक सैनिक भेजे भी अजरबैजान विजयी रहा। आर्मेनिया युद्ध को बुरी तरह से हार गया और एक रूसी समर्थित शांति समझौते में नागोर्नो – काराबाख से पीछे हटने को मजबूर हो गया ।

इस युद्ध के परिणाम से दुनिया भर के सैन्य योजना कारों को बुरी तरह झटका लगा है । इस युद्ध ने आधुनिक युद्धों को हमेशा के लिए बदल दिया है । टैंक, बख्तर बंद वाहन (पर्याप्त हवाई सुरक्षा के बिना) कुछ नहीं हैं, और उन्हें खिलौने की तरह उड़ाया जा सकता है । यही कारण है कि ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के पास केवल कुछ सौ टैंक हैं । दूसरे तरफ रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान आदि देशों में हजारों की मात्रा में टैंक हैं ।

भारत में दो हज़ार से अधिक टी -90 टैंक और 2400 से अधिक टी -72 टैंक और और सौ से अधिक भारत में ही विकसित अर्जुन टैंक हैं । उन्नत एंटी – टैंक पोर्टेबल मिसाइलों और उन्नत लड़ाकू विमानों के साथ टैंको का महत्व घट गया था ।

हम सभी ने देखा है कि कैसे अमेरिकी सेनाओं ने पहले खाड़ी युद्ध में सैकड़ों इराकी टैंकों को कुछ घंटो में नष्ट किया था । टैंक रोधी हथियारों की इस सूची में ड्रोन के खतरे को अब जोड़ा गया है । अमेरिका पिछले एक दशक से अधिक समय से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक में आतंकवादियों को मारने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन पहली बार ड्रोन का भी उपयोग किसी युद्ध में किया गया है ।

ड्रोन को अपनाने में भारत भी काम कर रहा है । भारत ने इस्राइल से ड्रोन खरीदे हैं, और वह उच्च श्रेणी के अमेरिकी ड्रोन भी चाहता है । साथ ही, भारत स्वदेशी ड्रोन भी विकसित कर रहा है । समय भी आ गया है, जब भारत को युद्धनीति में ड्रोन को अधिक महत्व देना चाहिए अन्यथा हम भविष्य में पाकिस्तान और चीन के साथ किसी भी संघर्ष में भारत को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है ।

चीन बहुत तेजी से ड्रोन तकनीक विकसित कर रहा है, और पाकिस्तान को भी ड्रोन की आपूर्ति कर रहा है । भारत को ड्रोन वायु रक्षा में भी निवेश करना होगा, क्योंकि कई पारंपरिक और महंगी हवाई रक्षा प्रणालियां ड्रोन के खिलाफ बहुत प्रभावी नहीं हैं ।

कोई भी भारत – पाकिस्तान या भारत – चीन युद्ध, अर्मेनिया – अजरबैजान युद्ध जैसा नहीं होगा क्योंकि हमारे मामले में किसी भी देश के पास किसी भी देश की वायुसेना का हवा में एक तरफा राज नहीं होगा । जब तक आप आकाश पर कब्ज़ा नहीं करेंगे तब तक, ड्रोन बहुत प्रभावी नहीं होंगे । लेकिन फिर आप सस्ते ड्रोन को शूट करने के लिए हमेशा महंगी मिसाइलों का उपयोग नहीं कर सकते ।

लेकिन फिर भी ड्रोन का अपना महत्व होगा और भारत को ड्रोन द्वारा उत्पन्न नए खतरे के प्रति जागना होगा । हमें अपना पैसा रक्षा आधुनिकीकरण पर समझदारी से खर्च करना चाहिए । भारत टैंक, बख्तर बंद वाहनों के स्थान पर ड्रोन पर अधिक खर्च कर सकता हैं, सेना में सैनिकों की संख्या कम कर सकते हैं, क्योंकि भारतीय सेना अब संख्या के मामले में सबसे बड़ी सेना है ।

मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भारत के पास एक बड़ा ड्रोन का जखीरा होगा । इन दिनों प्रभावी तकनीक और आधुनिक हथियार सेना के आकार से अधिक महत्वपूर्ण हैं, और इस लिए दुनिया की तमाम सेनाएँ अपने सैनिकों की संख्या कम कर रहे हैं और वही पैसा आधुनिक तकनीक पर यंत्रों पर खर्च लगा रहे हैं ।

अब हम दूसरे पहलू पर विचार करतें हैं । अब आर्मेनिया के ईसाई अपने ही घर जला रहे हैं । आर्मेनिया ने समझौते में नागोर्नो – काराबाख को मुस्लिम देश अज़रबैजान को देने की डील के बाद नागोर्नो – काराबाख के सारे ईसाई अपना ऑफिस अपना घर खुद ही जलाकर जा रहे हैं । उन्हें 12 घंटे का टाइम दिया गया है, लेकिन इन 12 घंटों में वह अपना सब कुछ जला कर यह इलाका छोड़ रहे हैं ।

भारत में भी लाहौर, पेशावर, मुल्तान, ढाका, गुजरांवाला और मीरपुरखास में बड़ी – बड़ी हवेलिया और बड़ी – बड़ी कोठियां रखने वाले हिंदुओं और सिखों को भी रातों – रात अपना सब कुछ छोड़ कर भागना पड़ा था । यह सब कुछ तब हुआ जब एक खास इलाके में जनसंख्या की डेमोग्राफिक बदल जाती है, और जब वह बहुमत में हो जाते हैं और दूसरे धर्म के लोग अल्पसंख्यक हो जाते हैं ।

यह नोगोनो करबाख हम सबकी आंखें खोलने वाली हैं, कि कहीं आने वाले 15 वर्षो बाद ऐसा नजारा भारत के कुछ इलाकों में भी ना देखने को मिले । और जो यह कहे कि यह कोरी कल्पना है, उनके मुंह पर थूक कर बता दीजिएगा कि नब्बे के दशक में कश्मीर घाटी से जब कश्मीरी हिंदू अपना सब कुछ छोड़ कर आए थे तो क्या वह कोरी कल्पना थी? भारत सरकार, पूरा संविधान, पूरी सेना और पूरी सरकारी मशीनरी होते हुए भी एक भी कश्मीरी हिंदू को घाटी में सुरक्षा नहीं दे पाई ।

अगर इन घटनाओं से कोई सीख नहीं ली तो भविष्य के भारत पर घोर काले बादल मंडरा रहे हैं ।

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