झारखंड में ईसाईयों के चेहरे को पूरी तरह बेनकाब करती डॉ शैलेन्द्र कुमार की पुस्तक ‘ईसावाद और औपनिवेशिक कानूनों के चक्रव्यूह में झारखंड’

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ईस्लाम के अनुयायियों द्वारा वर्ष 1990 में भारत का मुकुट कहलाने वाले जम्मू और कश्मीर राज्य की कश्मीर घाटी में वहां के मूल निवासियों अर्थात कश्मीरी हिन्दुओं के पैशाचिक संहार का पर्दाफाश करने वाली फिल्म ‘दी कश्मीर फाइल्स’ देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों, आन्दोलनजीवियों, लिब्रलों, टुकड़े टुकड़े गैंग, और उनके छर्रे कटोरियों की छाती पर मूँग दलते हुए रिकॉर्ड तोड़ रही है। इस फिल्म से देश में ही अनेक लोगों को ऐसे मरोड़ उठ रहे हैं जैसे सांप को डंडा पड़ने के बाद उठते हैं। बहुत समय बाद उर्दूवुड (बॉलीवुड) में किसी ने साहस किया जिससे कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा सार्वजनिक हुई जबकि इसी उर्दूवुड ने इससे पहले इस विषय को प्रेम कहानी और न जाने क्या क्या बनाकर दिखा दिया था। खैर! फिल्म की समीक्षा इस आलेख का विषय नहीं है।

यह आलेख सुप्रसिद्ध लेखक डॉ. शैलेन्द्र कुमार की नई पुस्तक ‘ईसावाद और औपनिवेशिक क़ानूनों के चक्रव्यूह में झारखंड’ जिसका प्रकाशन सभ्यता अध्ययन केंद्र, दिल्ली द्वारा किया गया है, की समीक्षा लिखने का गिलहरी प्रयास मात्र है। डॉ शैलेन्द्र कुमार की पिछली पुस्तक ईसावाद और पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक संहार की समीक्षा लिखने का गिलहरी प्रयास भी मैंने किया था, जिसको अभी तक 74000 से ज्यादा लोग पढ़ चुके हैं ।
इनकी वर्तमान पुस्तक ‘ईसावाद और औपनिवेशिक कानूनों के चक्रव्यूह में झारखंड’ के शीर्षक से ही समझ आ जाता है कि यह देश के खनिज संपदा से सम्पन्न राज्य झारखंड के परिप्रेक्ष्य में है। लेकिन वास्तव में पुस्तक का यह शीर्षक हिमशैल की नोक (टिप ऑफ़ आइसबर्ग) जैसा है। क्योंकि पुस्तक पढ़ने के बाद ईसावादी षड्यंत्रों का जो ट्रेंड समझ में आता है वह सर्वव्यापक है। यह ट्रेंड सम्पूर्ण देश में लागू होता है। झारखंड तो केवल एक केस स्टडी की तरह है। इसलिए पुस्तक की विषय वस्तु में झारखंड की ही बात की गई है।
174 पृष्ठों में समाहित 10 अध्यायों वाली इस पुस्तक में झारखंड राज्य (जिसका गठन आदिवासी जनता के उत्थान को आधार बनाकर हुआ था) के बारे में एक शोधपरक कार्य किया गया है। इस पुस्तक का जन्म ही झारखंड की यात्रा के कारण हुआ है। पुस्तक के प्राक्कथन में पृष्ठ 12- 13 पाठक को इस पुस्तक की महत्ता और लेखक की कलम की धार का परिचय करा देगी इसलिए प्राक्कथन ध्यान से पढ़ना आवश्यक है। वैसे तो पुस्तक के प्रथम 3 अध्यायों में लेखक की झारखंड यात्रा का विवरण है, लेकिन प्रत्येक अध्याय में लेखक ने कोई न कोई गंभीर विषय उठाया है। प्रथम अध्याय ‘दर्शनीय दुमका’ जहाँ आपको दुमका नामक स्थान के बारे में बतायेगा वहीं लेखक के शोध और चिंतन का परिचय भी देगा, जहाँ लेखक एक फल बेचने वाले अनपढ़ व्यक्ति को अरबी भाषा में ‘सूरा-ए-बकरा’ सुनते हुए पाते हैं जो अपने आप में एक अजीब सी बात है। प्रकृति प्रेमी आदिवासी समुदाय के लोग, ऊपर से अनपढ़ और सूरा-ए-बकरा’ है न अजीब बात। इसी अध्याय में मुसलमानों के बकरीद त्यौहार का असली अर्थ क्या है वो मेरे जैसे सामान्य पाठक को जानने को मिलेगा। यहाँ पाठक को पता चलेगा कि मुल्ला मौलवी या लोग कुछ भी रायता फैला लें लेकिन बकरीद का अर्थ बकरे की कुर्बानी देना नहीं है। इसी अध्याय में विकास संबंधी कुछ चिंताओं के साथ बाबा वैद्यनाथधाम देवघर और बाबा बासुकिनाथ धाम दुमका का भी सचित्र वर्णन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का वर्णन भी है।

दूसरे अध्याय ‘मलूटी में विश्व धरोहर’ में मलूटी के 108 मंदिरों के बारे में विस्तृत रूप से लिखा हुआ है। और चिंत्ता तथा आश्चर्य व्यक्त किया है कि ग्लोबल हेरिटेज फंड द्वारा वर्ष 2010 में मलूटी के मंदिरो को विश्व की 12 सर्वाधिक लुप्तप्राय धरोहरों की सूची में शामिल करने के बावजूद भी किसी ने इस गाँव की सुध नही ली और न इस गाँव की प्रसिद्धि में ही कोई बढ़ोतरी हुई। लेकिन जब 2015 के गणतंत्र दिवस समारोह में राज्य सरकार द्वारा दिल्ली में इसकी झाँकी प्रस्तुत की गई और उसी साल 2 अक्टूबर को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मलूटी की यात्रा की तब जाकर इस ओर देश दुनिया का ध्यान गया। तीसरे अध्याय ‘छिन्नमस्तिका देवी मंदिर’ में जहाँ मंदिर और देवी के अवतरण के बारे में बताया गया है वहीं पशुबलि को लेकर कठोर टिप्पणियां की गयी है जैसे,”मुझे समझ में नही आता कि बलि प्रथा पर हम क्यों नही क्यों रोक लगा सकते? वैसे मैं स्वीकार करता हूँ कि पहले की तुलना में इसमें कमी आई है और मैं जहाँ भी देवी मंदिर में जाता हूँ बलि को लेकर पुजारी बचाव में दिखते हैं। फिर भी प्रश्न यह है कि बलि हो ही क्यों ? जिस ईश्वर ने मनुष्य को बनाया है उसी ने उस जीव को भी बनाया है जिसकी बलि दी जाती है। इस तरह मनुष्य और वह जीव एक ही परिवार के सदस्य हैं। फिर कैसे हम अपने परिवार के एक सदस्य की बलि चढ़ा कर ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं?…. जहाँ तक मांसाहार का प्रश्न है तो हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जिस कारण से भारत अपने वैविध्यपूर्ण भोजन या व्यंजनो के लिए सारे संसार में सर्वप्रसिद्ध है उसका आधार शाकाहार ही है। इसमें मांसाहार का कोई योगदान नही है।

प्रथम तीन अध्यायों में एक निष्कर्ष निकलता है कि झारखंड में विकास की अपार क्षमता और असीम संभावनाएँ हैं। लेकिन छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम जैसे विकास अवरोधक व समाज विभाजक काश्तकारी कानूनों के चक्रव्यूह के कारण झारखंड के सर्वांगीण विकास का सपना आकार नहीं ले पाएगा। आगामी अध्यायों में इन विकास अवरोधक व समाज विभाजक काश्तकारी क़ानूनों के बारे में उनके पीछे ईसावाद की कुटिल साजिशों का पर्दाफाश किया गया है ऐसा लिखने में कोई बाधा नहीं है। अध्याय 4 में पाठक को पता चलेगा कि झारखंड में जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर एक-दो नही बल्कि तीन-तीन कानून हैं। वहीं देश के अधिकांश राज्यों में जमीन को लेकर केवल एक कानून है। अंग्रेज ईसाइयो ने 1908 में आदिवासियों की जमीन को बाहरियो से बचाने के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम बनाया था। इस अध्याय में लेखक इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि “हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि अंग्रेज ईसाइयो के शासनकाल में जब ये कानून बने थे तब से अब तक शिक्षा का भी काफी प्रसार हुआ है और इसलिए अब आदिवासियों को उस तरह बहला-फुसलाकर उनकी जमीन नही ली जा सकती। इस प्रकार आज के युग में यह कुतर्क के सिवाय कुछ नही है कि आदिवासी उतने शिक्षित और जागरुक नही हैं और उनकी जमीन न बिके, इसलिए कानून होना चाहिए। आखिर सारे देश में गरीब हैं और उनके पास भी थोड़ी-बहुत जमीन है, तो क्या उनकी जमीन सुरक्षित नही है ? असल में बात इतनी सरल नही है। आदिवासी के नाम पर कुछ और ही खेल चल रहा है।” लेखक अगले अध्याय में झारखंड में प्रचलित काश्तकारी अधिनियमों और ईसावादी चर्च द्वारा चलाए जाने वाले हिन्दुओं के धर्मांतरण अथवा मतांतरण की साजिशों में प्रमाण सहित संबंध स्थापित करते हैं। इस अध्याय में पाठक को इन अधिनियमों के पीछे के षड्यंत्रों की जड़ों का पता चलेगा और साथ ही अन्य चौंकाने वाली जानकारियों के साथ यह पता चलेगा कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम का प्रारूप एक कैथोलिक प्रीस्ट या मिशनरी जे.बी. हॉफमैन ने तैयार किया था।   इसी अध्याय में पाठकों को चौंकाने वाला तथ्य पता चलेगा कि रांची के पास का सिमडेगा जिला झारखंड का वैटिकन कहलाता है। जहाँ कुल जनसंख्या लगभग 6 लाख है, उसमें से लगभग 3 लाख लोग ईसाई हो चुके हैं और यहाँ से 400 से अधिक छोटे बड़े चर्च हैं। इस अध्याय में ईसावादी धर्मांतरण कैसे करते हैं और क्या क्या हथकंडे अपनाते हैं उन पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया है। लेखक यह भी स्वीकार करते हैं कि धर्मांतरण विरोधी कानून बनने से धर्मांतरण के मानवता विरोधी कुकर्म में कमी आयी है, लेकिन साथ ही ईसाईयों के दूसरे षड्यंत्र का पर्दाफाश भी करते हैं जिसके तहत अब ये लोग धर्मांतरण का धंधा शिक्षा के नाम पर झारखंड से बच्चों को पंजाब में ले जाकर करते हैं। लेखक ईसाईयों द्वारा लव जिहाद करने की बात को भी स्वीकार करते हैं। और ईसाईयत छोड़कर आयी एस्तर धनराज के हवाले से इसे प्रमाणित भी करते हैं। पुस्तक का अध्याय 5 पाठक को झकझोर देगा जब उसको ज्ञात होगा कि साजिश कितनी गहरी है। इसके लिए इतना ही लिखना पर्याप्त है।

अध्याय 6 तो और बड़ा बबाल काटता है। इसमें लेखक ने सिद्ध किया है कि इन काश्तकारी अधिनियमों से झारखंड की संस्कृति और पहचान का बहुत नुकसान हुआ है। इस अध्याय में ईसाइयों के 25 दिसम्बर और गुड फ्रायडे जैसे त्यौहारों की प्रासांगिकता पर बड़े कठोर प्रश्न चिन्ह लगाए गए हैं। कदाचित मेरे जैसे पाठकों के लिए ये सब नया और झकझोरने वाला है। पाठक को यहाँ जानकारी मिलेगी कि 19वीं शताब्दी तक क्रिसमस का त्यौहार मनाने वालों  को अमेरिका में सजा मिलती थी। अध्याय में दिए केरल और तमिलनाडु के उदाहरण लेखक की शोधपरक दृष्टि का अनुमान पाठक को देंगे। क्योंकि जो ईसाइयों द्वारा केरल या तमिलनाडु में किया गया है ठीक वैसा ही खेल झारखंड में भी चल रहा है। इस अध्याय में पाठक तथ्यों के आधार पर जानेगा कि जनजातीय समाज की पहचान और संस्कृति को संरक्षित रखने के लिए इन काश्तकारी अधिनियमो का कोई अर्थ नही है, क्योंकि इनका उद्देश्य ही कुछ और था। इतने सालों में इन काश्तकारी अधिनियमो के रहते हुए ही बड़ी संख्या में जनजातीय लोगो को ईसाई बनाया गया और कुछ को मुसलमान भी बनाया गया। और जो जनजातीय लोग और हिंदू ईसाई नहीं भी बनाए गए हैं उन पर ईसाई मिशनरी विद्यालयों की शिक्षा का गहरा प्रभाव पड़ा है और वे अपने धर्मों से विमुख ही हुए हैं। 

अध्याय 7 में लेखक ने गेंद झारखंड के बुद्धिजीवियों के पाले में फेंककर उन्हें यह प्रश्न पूछने की चुनौती दी है कि झारखंड बनने के दो दशक के बाद इस राज्य ने कितना विकास किया जो वह बिहार में रहते नही कर पाता ? झारखंड के साथ बने उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ से भी इसकी तुलना करनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि आज झारखंड कहाँ खड़ा है? इस अध्याय में लेखक ने इन प्रश्नों का तथ्यों सहित विस्तृत उत्तर दिया है और सिद्ध किया है कि एक अलग राज्य के रूप में झारखंड उस तरह लाभान्वित नही हो पाया जैसी कि वहाँ के लोगों को आशा थी। साथ ही यह निराशा भी प्रकट की है कि अब भी नहीं लगता है कि यह राज्य विकास की दौड़ में कोई छलांग लगा रहा है। साथ ही समस्या के सामाधान के रूप में सबसे पहले विकास-विरोधी काश्तकारी कानूनो को समाप्त करने पर जोर दिया है। और इसके साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ-साथ आधारभूत संरचना को सुदृढ़ करने की जरूरत पर बल दिया है। और सबसे महत्वपूर्ण सामाधान बताया है राजनीति में ईसाइयों के चर्च के हस्तक्षेप को समाप्त करना और चर्च को नए विद्यालय और अस्पताल खोलने से रोकना। तब जाकर झारखंड की विकास यात्रा आरंभ होगी। 

अध्याय 8 में लेखक ने तथ्यों के आधार पर झारखंड में संविधान की पाँचवीं अनुसूची की आड़ में होने वाले धर्मांन्तरण के षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है। इसी अध्याय में साहित्य निर्माण करके, पुस्तकें लिखकर संविधान की पाँचवीं अनुसूची को ढाल बनाकर कैसे खेल होता है उसका विस्तृत विवरण दिया गया है। अध्याय 9 का शीर्षक ‘झारखंड की राजनीति पर ईसावाद का ग्रहण’ अपने आप में ही पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। यहाँ लेखक अध्याय 8 में जिस ईसाई लेखक की पुस्तक के पाखंड का पर्दाफाश करते हैं, उसी पुस्तक की  प्रशंसा में ईसाई बिशप के शब्दों को पकड़कर उसकी खाल उधेड़ते हैं और भोली भाली जनता को सतर्क करने का प्रयास करते हैं। पुस्तक की प्रसंशा में आर्चबिशप एक जगह लिखता है,”हम आदिवासी जन विकास की परिभाषा स्वयं लिखें, इनके विकास के नीति संबंधी सिद्धांतो को आगे बढ़ाएं और राज्य का नवनिर्माण करें।”
लेखक की सूक्ष्म और शोधपरक दृष्टि का प्रमाण पाठक को यहां मिलेगा “जब वह बिशप के ‘हम आदिवासी जन’ शब्द को पकड़ लेते है और कहते है कि ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं। वास्तव में जब एक आदिवासी ईसाई बना दिया जाता है तब वह और कुछ नही केवल और केवल ईसाई ही रहता है। इस तरह आर्चबिशप कहाँ से आदिवासी हो गए ? और आर्चबिशप सभी आदिवासियो के स्वयंभू ठेकेदार कैसे बन गए ? इसके अतिरिक्त यह कहना कि ‘ हम आदिवासी जन विकास की परिभाषा स्वयं लिखें ’ के स्थान पर क्या यह कहना अच्छा नही होता कि हम सभी झारखंडवासी विकास की परिभाषा स्वयं लिखें ? क्या झारखंड में केवल आदिवासी ही पीड़ित और निर्धन हैं ? लेकिन नही। आर्चबिशप तो केवल आदिवासी की ही बात करेंगे, क्योंकि इसके पीछे एक सोची-समझी साजिश है।

वास्तव में बाइबिल में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि ईसाई एक साथ आदिवासी धर्म और ईसावाद को मानें। ईसावाद और मोहम्मदवाद का चरित्र ही ऐसा है कि जो एक बार ईसाई या मुसलमान बन गया, फिर वह किसी भी पंथ या संप्रदाय का नही रहता।” इस अध्याय में आदिवासियों के स्वयंभू ठेकेदार ईसाई मिशनरी और आर्चबिशप कैसे कैसे षड्यंत्र करते हैं उसका का उदाहरण सहित विवरण दिया गया है।  इस अध्याय में पृष्ठ संख्या 155 पर फुटनोट्स में दिए गए गाने के बोल जिसे एक कामवाली द्वारा गाया जाता है हर हिन्दू को सोचने पर विवश न करें तो हिन्दुओं का स्वयं से बड़ा दुश्मन दुनिया में और कोई न होगा। ध्यान देने की बात यह है कि उस लड़की को यह गीत ईसाईयों के एकल विद्यालय में सिखाया गया था। उस गीत के बोल हैं हिंदू हमारा कलेजा खाते हैं, हिंदू हमारा खून पीते हैं। हम हिन्दुओं को खतम कर देंगे …… अब विचार करना और इस विषवमन करने वाले ईसावाद से कैसे बचना यह काम हिन्दुओं का है क्योंकि उसको संग्रहालयों में भेजने की हर प्रकार की तैयारी का पर्दाफाश झारखंड के उदाहरण से इस पुस्तक में किया गया है। पुस्तक के अंतिम अध्याय में लेखक ने झारखंड के विकास में बाधा बने कारकों का समाधान बताने का उत्कृष्ट प्रयास किया है। एक पंक्ति में यदि कहा जाए तो केवल इतना ही कहा जाएगा “कानूनी और ईसावादी चक्रव्यूह से निकलकर ही झारखंड का विकास संभव हो पाएगा।”
डॉ शैलेन्द्र कुमार की यह पुस्तक ‘ईसावाद और औपनिवेशिक कानूनों के चक्रव्यूह में झारखंड’ ईसाइयों द्वारा झारखंड में प्रायोजित साजिशों का पर्दाफाश करती है और उनके द्वारा मानवता विरोधी तथा भोले भाले आदिवासियों के विरुद्ध किये जाने वाले कुकृत्यों पर कुठाराघात करती है। उदाहरण भले ही झारखंड का हो लेकिन यह पुस्तक सम्पूर्ण हिन्दू समाज को तथ्यों और प्रमाणों के साथ जागृत करने का साहसी प्रयास है। झारखंड के विषय में तो यह विकास की राह को सरल बनाने का आधार बन सकती है। बशर्ते लोग खासकर बहुसंख्यक हिन्दू समाज इस पुस्तक को पढ़े। झारखंड के नीति निर्धारकों को इन विषयों पर ध्यान देना चाहिए लेकिन यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक सत्ता पर ईसावाद का प्रभाव रहेगा। यह पुस्तक यदि झारखंड का युवा वर्ग पढ़े तो ईसावादियों के बिरसा मुंडा की धरती को मुक्ति मिलने में देर न लगेगी।

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