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Thursday, May 26, 2022

जानियें क्यों लेफ्ट-सेक्युलर लॉबी प्रधानमंत्री मोदी के “श्री केदारनाथ प्रोजेक्ट” से परेशान है

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5 नवंबर, 2021 को हमारे राष्ट्र के इतिहास में एक महान दिन की तरह याद किया जाएगा, क्यूकी इस दिन हमारी पुरातन सभ्यता की भलाई के लिए एक बहुत बड़ा कार्य किया गया है। केदारनाथ धाम में आदि शंकराचार्य जी की मूर्ति की स्थापना करना एक बहुत बड़ा कार्य है, जिसकी व्याख्या शब्दों में नहीं की जा सकती । श्री आदि शंकराचार्य जी भारत के सबसे महान धार्मिक गुरु और बौद्धिक दिग्गजों में से एक हैं जिन्होंने हमारी धर्म, सभ्यता, और संस्कृति को प्रभावित किया है जैसा किसी और ने पिछले 2000 वर्षों में नहीं किया है।

आदि शंकराचार्य जी ने आध्यात्मिकता, धर्म और धर्म के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनर्जीवित किया था। वह ऐसे समय में जन्मे थे, जब हिंदू धर्म कई प्रकार की समस्याओ से घिरा हुआ था, तथा भीतर और बाहर की कई विपरीत ताकतों से कमजोर हो गया था। आदि शंकराचार्य जी की महानता ये थी कि उन्होंने कुछ भी नया बनाने का दावा नहीं किया, उन्होंने कोई नया संप्रदाय नहीं बनाया, लेकिन सनातन धर्म के प्राचीन ज्ञान को व्यावहारिक टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत किया और अद्वैत के दर्शन को जनता के बीच प्रदर्शित भी किया।

आदि शंकराचार्य ने बौद्धिक विरोधियों पर विजय पाने के लिए ‘शस्त्रार्थ’ या ‘वाद-विवाद’ की सनातन परंपरा को पुनर्जीवित किया, बजाये कोई बल प्रयोग करने के। उन्होंने पूरे भारत में यात्रा की और विभिन्न परंपराओं के विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया। उन्होंने बौद्ध विद्वानों पर जीत हासिल की और महान विद्वान मंडन मिश्रा के साथ शस्त्रार्थ भारतीय परम्पराओ में एक मील का पत्थर माना जाता है। मंडन मिश्रा ने अंततः हार मान ली और उन्हें आदि शंकराचार्य के अधीन संन्यास लेना पड़ा। तदुपरांत मंडन मिश्रा जी की पत्नी ने भी आदि शंकराचार्य से शस्त्रार्थ किया।

एक लंबी बहस के बाद वे भी आखिरकार हार गई, लेकिन इस घटना से पता चलता है कि महिलाओं को समान सम्मान दिया जाता था, वे उच्च आध्यात्मिक लक्ष्यों का पीछा करने के लिए स्वतंत्र थीं। यही वह समय था जब चर्च का जन्म हुआ था, और चर्च ये बहस किया करता था कि क्या महिलाओं में आत्मा होती है, क्या उनके साथ समान व्यवहार किया जा सकता है। नारी को निम्न जीवन रूप माना जाता था क्योंकि उसने आदम को ‘मूल पाप’ करने के लिए राजी किया था।

एक भू-सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में भारत परिकल्पना आदि शंकराचार्य के बनाये चार मठों में प्रकट होती है, उन्होंने इन चार पवित्र तीर्थ क्षेत्रों (चार धाम) को बना कर धर्म कि महिमा को फिर से प्रज्वलित कर दिया था । यह भारत के विचार में एक बहुत बड़ा योगदान है, उन्होंने बत्तीस साल की उम्र में वो सब हासिल कोय जो लोग जन्मो जन्मो तक नहीं कर पाते । उन्होंने पूरे भारत में पैदल यात्रा की , शास्त्रार्थ किया, चार मठो को स्थापित किया, मठ चलाने की एक उचित प्रणाली बनायी और अंततः समाधि भी ली, जो सभी के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है, और इससे आज के युवा भी काफी कुछ सीख सकते हैं।

श्री केदारनाथ जी में समारोह हुआ, तब हमने भी ये महसूस किया कि आदि शंकराचार्य को उचित सम्मान नहीं मिला, और हमारे समाज का इसमें सामूहिक दोष है । प्रधानमंत्री मोदी जी के उस दिन के भाषण में आदि शंकराचार्य जी के व्यक्तित्व का खूबसूरती से चित्रण किया गया था। हालांकि ये हमारे समाज के लिए एक शर्मिंदा होने वाली बात है कि केरल का कोच्चि हवाई अड्डा, जो आदि शंकराचार्य जी के जन्म स्थान से कुछ ही किलोमीटर दूर है, उसका नाम भी शंकराचार्य जी के नाम पर नहीं रखा गया, जबकि इसकी मांग 1990 के दशक से निरंतर की जा रही है।

प्रधानमंत्री मोदी जी ने आदि शंकराचार्य जी की मूर्ती का अनावरण करने के बाद अपने भाषण में हिन्दू विरोधियो की भीड़ पर नमक छिड़कते हुए उन्हें याद दिलाया कि सभी 12 ज्योतिर्लिंगों और 4 मठों के साथ-साथ हजारो संतों और बुद्धिजीवि लोग इस महान घटना को देख रहे हैं, और इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बन रहे हैं। इसके दो अंतर्निहित संदेश थे – कि बारह ज्योतिर्लिंग इस प्राचीन भूमि की भू-सांस्कृतिक एकता को भी दर्शाते हैं, और यही हम सब हिन्दुओ को एकता के सूत्र में बांधती है, और यही एक कारण है की विदेशी आक्रांताओ और सेकुलरो के लगातार होते हमलो के बाद भी सनातन अभी तक फलफूल ही रहा है।

आदि शंकराचार्य के बारे में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्होंने हमारी ज्ञान परंपरा को पुरजोर ताकत से जगाया। ये महान परंपरा केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य आदि में भी हमे इसी परंपरा के लक्षण दीखते हैं । अब भारत ताजमहल और सपेरों की छाया से बाहर निकल गया है। सत्तर वर्षों तक, हमारी ज्ञान प्रणालियाँ धर्मनिरपेक्ष इतिहास लेखन के मलबे में दब गईं, जिसने हमारी महान सभ्यता की हर उपलब्धि को नकार दिया।

जिस तरह से उनकी सरकार और राज्य की भाजपा सरकारों ने केदारनाथ, काशी, मथुरा, वृंदावन, कुशीनगर आदि विभिन्न तीर्थ केंद्रों का जीर्णोद्धार और उन्नयन किया है, वह दूसरों के लिए एक सबक है कि धार्मिक केंद्रों की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए कैसे बनाए रखा जाए। भारत के नागरिकों को विभिन्न धार्मिक सर्किटों की आध्यात्मिक यात्रा करने के लिए उनका आह्वान, जिसे सरकार इस भूमि से जोड़ने के लिए बढ़ावा दे रही है, ये हमे हमारी सभ्यता की जड़ों में वापस जाने का आह्वान ही है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के बाद आयुष मंत्रालय और नई शिक्षा नीति की स्थापना के साथ, पीएम मोदी ने उन भारतीयों के लिए एक सकारात्मक वातावरण बनाया है, जो दशकों से भारत के बारे में गलत धारणा रखते थे, जिनके लिए भारत का मतलब गरीबी, अंधेरे युग की रूढ़िवादिता, जातिवाद, महिला उत्पीड़न ही था। लेकिन इन कदमो से प्रधानमंत्री मोदी ने हिंदू संस्कृति का पुनर्जागरण करना शुरू कर दिया है, जिस वजह से वामपंथी और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग उनसे चिढ़े हुए हैं। दुर्भाग्य से, एकतरफ सरकार इन वामपंथी और सेकुलरो के छद्म दुष्प्रचार से लड़ रही है, वहीं दूसरी ओर हमारे ही कुछ हिन्दू जन प्रधानमंत्री मोदी के कार्यो को शक कि नजरो से देखते हैं।

यहां ये जानना भी जरूरी है कि यह धार्मिक पुनर्जागरण हमारे आर्थिक पुनर्जागरण से भी जुड़ा हुआ है। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तराखंड के बारे में बताया, उससे पूरे भारत में और हिन्दू धार्मिक स्थानों के आसपास के बुनियादी ढांचे के निर्माण से स्थानीय रोजगार और सूक्ष्म और लघु व्यवसायों को बहुत बढ़ावा मिलेगा। केदारनाथ धाम के ‘राजनीतिकरण’ के बारे में मोदी जी की आलोचना करने वाले भूल जाते हैं कि उन्होंने 2013 की आपदा के बाद केदारनाथ धाम के पुनर्वास और पुनर्निर्माण में मदद करने के लिए स्वेच्छा से मदद की थी लेकिन क्षुद्र राजनीति ने इसकी अनुमति नहीं दी। सत्ता में आने के बाद, वह अपनी प्रतिबद्धता को नहीं भूले और एक ऐसा मॉडल बनाने में मदद की जो बढ़ती तीर्थयात्रा और उसकी पवित्रता को बनाए रखता है।

धर्मनिरपेक्षता की हमारी भावना विकृत है, जहां हम इंजीलवादी टेरेसा को मूर्तिमान कर सकते हैं और उनके सामने साष्टांग प्रणाम कर सकते हैं, धार्मिक कैलेंडर में बलात्कारी मौलवियों को प्रकाशित कर सकते हैं, अल्पसंख्यक मौलवियों को वेतन दे सकते हैं, इफ्तार पार्टियों का जश्न मना सकते हैं, यहां तक ​​कि नमाज भी पढ़ सकते हैं। जबकि इनका विरोध करने पर ओर अपने धर्म का प्रदर्शन करने भर से हिन्दू को सांप्रदायिक होने का तमगा दे दिया जाता है।

यहाँ ये समझना जरूरी है कि हमारी संस्कृति में आधुनिक विचारों को चुनना और सदियों पुराणी ज्ञान प्रणालियों के साथ उन्हें जोड़ना अच्छा माना जाता है । वहीं हमारे समाज को भारत के बारे में नकारात्मकता से बाहर आने की जरूरत है। मैकाले से प्रेरित वामपंथी इकोसिस्टम को अब ख़त्म करने का समय आ गया है, ओर आदि शंकराचार्य जी कि मूर्ती का अनावरण उसी दिशा में पहला कदम है, ओर इसी वजह से वामपंथी ओर सेकुलरो को इस घटना से जलन हो रही है ।

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