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Tuesday, June 15, 2021

चौरी चौरा : इतिहास के पन्नों मैं कैद वो सच्चाई जो वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकार नहीं बताएँगे।

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास अनेक रोमांचक घटनाओं और उतार चढावों से भरा पड़ा है! इसमें जहाँ एक तरफ महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर चलते हुए स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने के उदाहरण मिलते हैं, वहीं दूसरी तरफ अहिंसा को नकार कर ईंट का जवाब पत्थर से देने के उदाहरण भी मिलते हैं!

भारत की आजादी की लड़ाई के दौरान घटी अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है #चौरी चौरा की घटना, जिसने स्वाधीनता आंदोलन की दिशा और दशा ही बदल कर रख दी और ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया!

वह 1922 का वर्ष था! समूचे भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ाई अपने चरम पर थी और पूरे देश में जैसे अंधेरे का साम्राज्य व्याप्त था! महात्मा गांधी के नेतृत्व में उस समय पूरे देश में #असहयोग आंदोलन चल रहा था!

इस आंदोलन की महत्वपूर्ण बात यह थी कि जन सामान्य द्वारा ब्रिटिश हुकूमत का बहिष्कार करने और उन्हें किसी भी प्रकार का सहयोग न करने की शपथ ली गई थी!

इसी बीच 4 फरवरी 1922 को चौरीचौरा के भोपा बाजार में करीब तीन हजार सत्याग्रही इकट्ठा हुए और थाने के सामने से जुलूस की शक्ल में गुजर रहे थे! तत्कालीन थानेदार ने जुलूस को अवैध मजमा घोषित कर दिया और एक अंग्रेज सिपाही ने गांधी टोपी को पांवों तले रौंद दिया!

यह देख सत्याग्रही आक्रोशित हो गए और जब उन्होंने विरोध किया तो पुलिस ने जुलूस पर फायरिंग शुरू कर दी जिसमें 11 सत्याग्रही मौके पर ही शहीद हो गए जबकि 50 से ज्यादा घायल हो गए!

गोली खत्म होने पर पुलिसकर्मी थाने की तरफ भागे! भड़की भीड़ ने उनका पीछा किया और थाने के पास स्थित दुकान से एक टीन केरोसीन तेल उठा लिया!

इसके बाद गुस्साए सत्याग्रहियों ने स्थानीय जमींदार संत बक्श सिंह के नेतृत्व में मूंज और सरपत का बोझा थाना परिसर में बिछाकर उस पर केरोसीन उड़ेलकर आग लगा दी! थानेदार ने भागने की कोशिश की तो भीड़ ने उसे पकड़कर आग में फेंक दिया!

इस कांड में थानेदार समेत 23 सिपाही आग में जलकर मारे गए! यह घटना दोपहर के करीब डेढ़ बजे शुरू हुई थी जो चार बजे तक चलती रही!

इस कांड में एक सिपाही मोहम्मद सिद्दिकी भाग निकला और झंगहा पहुंच कर गोरखपुर के तत्कालीन कलेक्टर को उसने घटना की सूचना दी!

इस घटना से गुस्साई अंग्रेजी सरकार ने इलाके के लोगों पर कहर ढाना शुरू दिया! लोगों पर अत्याचार देखकर पूर्वांचल के गांधी कहे जाने वाले देवरिया के संत बाबा राघव दास ने जाने-माने अधिवक्ता मदन मोहन मालवीय से क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ने की अपील की! बाबा के कहने पर मदन मोहन मालवीय ने क्रांतिकारियों का केस लड़ा!

मालवीय जी की पैरवी के बाद उस घटना में फांसी की सजा पाए 114 लोगों में से मात्र 19 क्रांतिकारियों को ही फांसी की सजा दी जा सकी और 95 सत्याग्रही सुरक्षित बच गए!

4 फरवरी 1922 को घटित हुई यह घटना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में #चौरी चौरा काण्ड के नाम से प्रसिद्ध है!

हिंसा के सख्त खिलाफ महात्मा गांधी ने इस घटना के परिणामस्वरूप दुखी होकर, 12 फरवरी 1922 को राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था, यद्यपि उन्हें ऐसा करने से कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं ने मना किया था और कहा था कि ऐसा करने से यह देशव्यापी आंदोलन कई वर्ष पीछे चला जाएगा, परन्तु गाँधीजी नहीं माने!

16 फरवरी 1922 को महात्मा गांधी ने अपने लेख ‘चौरी चौरा का अपराध’ में लिखा था कि …”अगर ये आंदोलन वापस नहीं लिया जाता तो अन्य जगहों पर भी इस तरह की घटनाएं देखने को मिल सकती थीं!”

हालांकि गांधी जी के इस फैसले को लेकर क्रांतिकारियों ने नाराजगी जाहिर की थी और उस कारण कांग्रेस दो दलों में विभाजित हो गई-गरम दल और नरम दल!

यद्यपि यह घटना 1922 में घटित हुई, किंतु इसकी पृष्ठभूमि 1917 में ही गाँधीजी के चंपारण सत्याग्रह के दौरान चंपारण आने और तत्पश्चात 1920 में गोरखपुर आने के साथ ही बननी आरम्भ हो गई थी! गाँधीजी के सत्याग्रह की सफलता और उनके पूर्वांचल आने के साथ ही जगह जगह पर आन्दोलन होने लगे थे और इन्ही की परिणीति चौरी चौरा की घटना के रूप में दिखाई दी!

चौरी-चौरा कांड की याद में 1973 में गोरखपुर में इस जगह पर 12.2 मीटर ऊंची एक मीनार बनाई गई! इसके दोनों तरफ एक शहीद को फांसी से लटकते हुए दिखाया गया!

बाद में भारतीय रेलवे ने दो ट्रेनें भी चौरी-चौरा के शहीदों के नाम से चलवाई! इन ट्रेनों के नाम हैं -शहीद एक्सप्रेस और चौरी-चौरा एक्सप्रेस!

जनवरी 1885 में यहां चौरी चौरा नाम से एक रेलवे स्टेशन की स्थापना की गई!

कुल मिलाकर चौरी चौरा की घटना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया और साथ ही गोरखपुर के एक छोटे से क्षेत्र चौरी चौरा को पूरे देश भर में चर्चित कर दिया!

चौरी चौरा में बना स्मारक आज भी उन सत्याग्रहियों और शहीदों की याद दिलाता है और हमारी आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के प्रति मन में श्रद्धाभाव जागृत करता है!

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