‘आर्य (श्रेष्ठ) भारत’ पुस्तक के माध्यम से इंद्र सिंह डोगरा ने भारत को भारत की दृष्टि से समझाने का एक उत्कृष्ट शोधपरक प्रयास किया है।

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ऐसा कहते हैं कि भविष्य वर्तमान पर टिका होता है और वर्तमान अतीत के अनुभवों पर। अतीत के अनुभव ही इतिहास कहलाते हैं। इतिहास अर्थात ऐसा ही हुआ। यह बात भी सर्वमान्य है कि जो लोग या देश अपना इतिहास भूल जाते हैं उनका भूगोल बदल जाता है। यह भी सत्य है कि भारत के इतिहास लेखन में बहुत बड़े बड़े कुटिल खेल हुए हैं जिसके कारण आज हम भारत की संतानों में ही भारत का विरोध करने की प्रवृति देखते हैं, उनके लिए भारत में श्रेष्ठ जैसा कुछ नहीं है, उनकी आस्थाओं के केंद्र अमेरिका, इंग्लैंड, जैसे देश हैं। यहाँ तक बहुतों का दिल तो भारत के शत्रु देश पाकिस्तान के लिए भी धड़कता है। अब प्रश्न उठता है आखिर ऐसा क्यों है? इसके पीछे क्या कारण हैं? इन प्रश्नों के उत्तर भी लगभग सब जानते हैं लेकिन निवारण की दिशा में काम बहुत ही बिरले लोग करते हैं। कारण है भारत की विकृत शिक्षा पद्धति और विशेषकर इतिहास लेखन में जानबूझकर की गयी साज़िश। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीयों को वास्तविक इतिहास बताया ही न गया। सारा इतिहास उन लोगों ने लिखा जिनके दिल में रूस, चीन, अरब या फिर लंदन और अमेरिका बसता था। लेकिन अब कुछ समय से घड़ी की सुई ने दिशा और गति बदली है। अनेक भारत पुत्रों ने भारत विरोधियों द्वारा इतिहास में की गयी छेड़छाड़ करने की साजिश का पर्दाफाश करने का काम शुरू किया है। जिससे उन तथाकथित इतिहासकारों और उनके आकाओं के मन में खलबली तो मची है। परिणामस्वरूप भारत के लोग अब जागरूक हो रहे हैं। दी कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्म का कम समय में सुपरहिट हो जाना इसी जागरण का प्रमाण है।

इतिहास लेखन के ऐसे ही भारत केंद्रित प्रयासों में एक प्रयास किया है देवभूमि हिमाचल के सुप्रसिद्ध व्यवसायी और इतिहासकार श्री इंद्र सिंह डोगरा ने। श्री डोगरा ने एक पुस्तक लिखी है जिसका शीर्षक है ‘आर्य (श्रेष्ठ) भारत’, इस पुस्तक में भारत भूमि के आर्यत्व अर्थात श्रेष्ठता का बोध कराने का एक उत्कृष्ट प्रयास किया गया है। पुस्तक का प्राक्कथन अपने आप में एक छोटी सी पुस्तक समान है, इसका एक एक शब्द चुन चुनकर और कदाचित शोध करने के बाद ही लिखा गया है। इसमें पाठक को संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली रूप में प्राचीन भारत में शिक्षा की स्थिति, बाहरी आक्रांताओं द्वारा भारत पर आक्रमण, मैकॉले और मैक्समूलर के कुकर्म, स्वतंत्रता के बाद देश की शिक्षा और अंत में इस बिगड़े हुए शिक्षा तंत्र को ठीक करने के लिए क्या किया जाना चाहिए- ये समाधान भी  दिया गए है। इसलिए इस पुस्तक का प्राक्कथन बड़े ध्यान से पढ़ने की आवश्यकता है। यहीं से पाठक के मन में इन पुस्तक को एक बार में में पढ़कर समाप्त करने की इच्छा जागृत होगी।
वैसे तो यह पुस्तक हर आयु वर्ग के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन शायद लेखक ने तरुण या युवा वर्ग को ध्यान में रखकर इस पुस्तक को लिखा है। वर्ष प्रतिपदा उत्सव एवं कालगणना का वैश्विक दर्शन अध्याय पाठक को भारत की विज्ञान आधारित कालगणना के दर्शन कराएगा जो ‘ड्यूडस’ और ‘कूल गायस’ को सोचने पर विवश करेगा कि विदेशियों ने ही सब कुछ नहीं खोजा है। ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में भारत चिरकाल से अग्रणी और श्रेष्ठ रहा है। विश्वव्यापिनी हिन्दू संस्कृति अध्याय पाठकों बताएगा कि भारत की विश्व का कल्याण चाहने वाली संस्कृति यानी हिन्दू संस्कृति का विस्तार दुनियाभर में था। इस काम को और अधिक सरल   और प्रभावशाली बनाने के लिए लेखक ने मानचित्रों और टेबल्स का उपयोग किया है, जो लेखक की दूरदर्शिता का प्रमाण है।
इस पुस्तक की एक और विशेषता है कि इसमें आवश्यकतानुसार चित्रों का उपयोग किया है जो विषय को समझने में बहुत सहायक हैं। हमारे वेद उपनिषद पुराण, विश्व के प्राचीन राष्ट्र और वैदिक सलिला सरस्वती अध्याय पाठक को एक अलग ही बौद्धिक यात्रा पर ले जा सकते हैं। पृष्ठ संख्या 58-76 में दिया गया अध्याय वृहद् सांस्कृतिक भारत मानचित्रों और चित्रों सहित युवा पाठकों को उस भारत के दर्शन दर्शन कराएगा जिसकी शायद उन्होंने कल्पना भी न की होगी। इस पुस्तक में भारत में समरसता के विषय को हल्का सा छूने के प्रयास किया गया है, लेकिन यह बात स्पष्ट लिखी गयी है की भारत में छुआछूत की बीमारी प्राचीन समय में नहीं थी। यह सारी साजिश मुस्लिम और अंग्रेज आक्रांताओं द्वारा की गयी थी।
अब तक की समीक्षा में पाठक को लगेगा कि श्री डोगरा की इस पुस्तक में भारत के ऐतिहासिक और बड़े बड़े विषयों पर शोधपूर्ण लिखा गया होगा। परन्तु लेखक ने इस पुस्तक को आम परिपाटी से थोड़ा अलग तरीके से प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में लेखक ने भारत के ऐतिहासिक महापुरुषों जैसे सत्यव्रती राजा हरिश्चंद्र, गुरु तेग बहादुर, गुर गोविन्द सिंह के वीर पुत्र, वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप के जीवन का उत्कृष्ट प्रस्तुतिकरण किया है वहीं जो लोग कहते हैं कि हिन्दू समाज में नारी शक्ति की भूमिका केवल चूल्हे चौके तक ही थी उनके इस भ्रम का निवारण करने के लिए लेखक ने उदाहरण स्वरुप सती अनुसूया, मैत्रेयी और रानी लक्ष्मी बायीं जैसी वीरांगना पर अलग अलग अध्याय लिखा है।
आज असम के महान वीर लाचित बरफुकन के बारे में कितने लोग जानते हैं? उत्तर मिलेगा ये कौन थे? यह पुस्तक एक अलग अध्याय में पाठक को वीर लाचित बरफुकन और असम के इतिहास में उनकी वीरतापूर्ण भूमिका के बारे में बताएगी। यह पुस्तक गागर में सागर भरने का एक उत्कृष्ट प्रयास है जिसके अंतर्गत पाठक को नेताजी सुभास चंद्र बोस, भगत सिंह और जय जवान किसान का उद्घोष करने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री और उनके जीवन से जुड़े रहस्यों के बारे में जानने को मिलेगा।
 यह सच है कि एक पुस्तक के माध्यम से भारत के आर्यत्व या श्रेष्ठता को बता पाना सम्भव नहीं है। लेकिन आर्य(श्रेष्ठ) भारत पुस्तक सभी आयु वर्ग के लोगों के साथ विशेषकर कॉलेज स्तर के युवाओं के लिए एक कम्प्लीट पैकेज है। जिसका लाभ उनको अवश्य लेना चाहिए ताकि वे भारत को भारत की दृष्टि से समझ सके। ताकि वे आर्य भारत के बाहर से आये इस झूठ को समझ सके, ताकि वे आर्य द्रविड़ के झूठे प्रपंच से बच सकें, ताकि वे भारत के वीर सपूतों और महापुरुषों के बारे में जान सके और गर्व की अनुभूति कर सकें। 

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