कहानी राजा महेंद्र प्रताप सिंह की; जिन्होंने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए जमीन दी, लेकिन वहीं क्यों होता है उनका सब से ज्यादा विरोध?

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Picture Credit - News 18

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर एक यूनिवर्सिटी का शिलान्यास किया है। आपको ज्ञात होगा कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सितंबर, 2019 में अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम एक राज्य स्तरीय यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा की थी। ये यूनिवर्सिटी अलीगढ कि कोल तहसील में बनायी गयी है, जहाँ इसके लिए 92 एकड़ जमीन भी आवंटित की गयी है।

यूनिवर्सिटी के शिलान्यास कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा महेंद्र प्रताप की तारीफ की, और युवाओ को उनसे प्रेरणा लेने का आह्वान भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि युवा कभी भी अवसाद में हों तो वो राजा महेंद्र प्रताप का स्मरण करें, उनके त्याग और दृढ़ निश्चय का स्मरण करें और जीवन में आगे बढ़ें।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह एक प्रसिद्द जाट राजा थे, जिनका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में काफी बड़ा योगदान भी था, बहुत ही कम लोगो को पता होगा कि उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई. उन्होंने समाज और आमजन के लिए कई तरह के संस्थान भी खोले थे. अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए भी उन्होंने ही जमीन दी थी, लेकिन आज उसी यूनिवर्सिटी में उनके लिए कोई स्थान नहीं, जबकि वहां जिन्ना जैसे देशद्रोही और देश तोड़ने वाले इंसान कि तस्वीर लगाई जाती है।

उनके योगदान को पूरी तरह भुला दिया गया. उनसे कम योगदान देने वालों का नाम पिछली सरकारों में हर दूसरे तीसरे दिन लिया जाता रहा, लेकिन जाट समुदाय के इतने महान नेता के योगदान को याद नहीं रखा गया। आज इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको महान राजा महेंद्र प्रताप सिंह जी के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे, और उनके योगदान के बारे में जानेंगे।

कौन थे राजा महेंद्र प्रताप सिंह?

महेंद्र प्रताप सिंह हाथरस ज़िले के मुरसान रियासत के राजा थे। जाट परिवार के राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नामचीन शख़्सियत थे, जो काफी पढ़े लिखे भी थे और शुरुआत में उन्होंने एक पत्रकार की भूमिका भी निभायी। पहले विश्वयुद्ध के दौरान राजा महेंद्र प्रताप सिंह अफ़ग़ानिस्तान चले गए थे और वहां जाकर उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई, और इस निर्वासित सरकार के वे राष्ट्रपति थे।

एक दिसंबर, 1915 को उन्होंने इस सरकार की स्थापना की, इस सरकार का अर्थ था अंग्रेज़ों के अधिपत्य में रहते हुए भी स्वतंत्र भारतीय सरकार की घोषणा करना। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जो बड़ा काम किया था, बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी यही कार्य किया था, जब अंडमान निकोबार द्वीप से उन्होंने निर्वासित भारतीय सरकार बनाने की घोषणा की थी। देखा जाए तो दोनों में ये एक बहुत बड़ी समानता थी।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह वैसे तो कांग्रेस से जुड़े हुए नहीं थे, लेकिन सभी राजनीतिक पार्टी के लोग उनका सम्मान करते थे। उस दौर के बड़े कांग्रेसी नेता उनके बारे में जानते थे, उनके द्वारा किये गए कार्यो के बारे में अवगत थे। यहाँ तक कि महात्मा गाँधी भी उनके बड़े प्रशंसक थे।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ में महात्मा गांधी के उनके बारे में विचारो को प्रकाशित किया गया है, जहां होता है जिसमें उनके महात्मा गांधी से संपर्क का ज़िक्र है. महात्मा गांधी ने राजा साहब के लिए कहा था कि “राजा महेंद्र प्रताप के लिए 1915 में ही मेरे हृदय में आदर पैदा हो गया था. उससे पहले भी उनकी ख्याति का हाल अफ़्रीका में मेरे पास आ गया था. उनका पत्र व्यवहार मुझसे होता रहा है जिससे मैं उन्हें अच्छी तरह से जान सका हूं. उनका त्याग और देशभक्ति सराहनीय है.”

कांग्रेस ने नहीं दी राजा महेंद्र प्रताप सिंह को ज़्यादा तरजीह

अफ़ग़ानिस्तान से राजा महेंद्र प्रताप सिंह भारत वापस लौटे और स्वतंत्रता के बाद सक्रिय राजनीति में भी उन्होंने भाग लिया । राजा महेंद्र प्रताप सिंह 32 साल तक देश से बाहर रहे और उन्होंने हर संभव प्रयास किया भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए दूसरे देशो का सहयोग लेने की, उन्होंने रूस, जर्मनी, और जापान जैसे देशों से मदद माँगी, लेकिन किसी कारणवश वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए।

1946 में भारत लौट कर उन्होंने सबसे पहले महात्मा गाँधी से मुलाकात की और उन्हें अपना सहयोग देने का वायदा किया, लेकिन भारतीय राजनीति में उस दौर में सिर्फ कांग्रेस का बोलबाला था, और उन्होंने राजा महेंद्र प्रताप सिंह को कभी भी कोई अहम ज़िम्मेदारी निभाने का मौक़ा नहीं दिया।

इसका एक सबसे बड़ा कारण था जवाहर लाल नेहरू का उन्हें पसंद ना करना। नेहरू की विदेश नीति में जापान और जर्मनी कभी भी मित्र देश नहीं रहे थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने इन देशों से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मदद माँगकर सही नहीं किया, ये एक बड़ी वजह थी कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह को कांग्रेस में बहुत ज़्यादा तरजीह नहीं मिली.

शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान था

राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने राजनीती और स्वतंत्रता संग्राम के सहयोग किया था, लेकिन इसके अलावा उनकी पहचान एक बड़े समाजसेवी के तौर पर ज़रूर बन गई थी, जो शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए लगातार प्रयत्न करते रहते थे और साथ ही साथ धन संपदा भी दान करते रहते थे।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह के पिता राजा घनश्याम सिंह भी एक प्रसिद्ध इंसान थे, और वे सर सैय्यद अहमद ख़ान के दोस्त थे। उनके परिवार ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और अन्य कई स्कूल कॉलेज के लिए जमीन और वित्तीय मदद की थी। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को 1929 में 3.8 एकड़ की ज़मीन दान भी कि थी।

जिन्हे दान दिया, उन्होंने ही भुला दिया

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हमेषा से धार्मिक वैमनस्य का प्रतीक रही है, वहाँ आपको कई मुस्लिम हस्तियों के नाम पर सर सैय्यद हॉल, मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी जैसी इमारतें मिलेंगी, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम से वहां कोई शिलालेख तक भी नहीं।

ये देख कर बड़ा दुःख होता है कि अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए बड़ा योगदान करने वाले के लिए वहां कोई स्थान नहीं है, वहीं भारत का विभाजन कराने वाले मुहम्मद अली जिन्ना जैसे इंसान की तस्वीर वहां बड़े ही शानोशौकत से लगाई जाती है।

क्या ये बीजेपी की एक राजनीती है ?

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने इस यूनिवर्सिटी की शुरुआत करके आज की पीढ़ी का परिचय राजा महेंद्र प्रताप सिंह से कराने का एक और प्रयास किया है। विपक्ष कह रहा है कि बीजेपी इस मुद्दे पर राजनीती कर रही है, और राजा महेंद्र प्रताप सिंह का उपयोग करके अपना वोट बैंक बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कुछ लोग इसे बीजेपी की चाल बता रहे हैं, जिसके द्वारा वो जाट समुदाय को साधने का प्रयास कर रही है, जो ने कृषि कानूनों की वजह से मोदी सरकार का विरोध कर रहे हैं।

विपक्ष जो चाहे कहता रहे, लेकिन एक बात तो सही है कि राजनीतिक कारणों से राजा महेंद्र प्रताप सिंह को भुला दिया गया था, जिसे आज बीजेपी ठीक करने की कोशिश कर रही है। एक ऐसे राजा जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बड़ी भागीदारी कि हो, शिक्षा और समाज कल्याण का काम किया हो, उन्हें याद रखा ही जाना चाहिए। आज उनके नाम से एक यूनिवर्सिटी बना कर सरकार ने उन्हें एक सच्ची श्रद्धांजलि ही दी है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

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