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Thursday, August 5, 2021

किं मान्यते कुंभ किमस्ति च् कुंभस्य इतिहास ? सम्प्रत्या: कुत्र भविष्यति महाकुंभ ? क्यों मनाया जाता है कुंभ और क्या है कुंभ का इतिहास ? अबकी कहाँ होगा महाकुंभ ?

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हिंदू धर्मे कुंभमेलकस्य विशेषमहत्वमस्ति ! इदम् कथानक समुद्र मंथनेन संलग्नमस्ति ! कथ्यन्ते महर्षि दुर्वासायाः श्रापस्य कारणम् यदा इंद्र देव: च् क्षीण: जाता:,तदा निशाचरा: देवेषु आक्रमण कृत तै: पराजिता: स्म ! सर्वदेवा: मेलित्वा भगवतः नारायणस्य पार्श्व प्राप्ता: तेन सम्पूर्ण वृतांत प्रतिभाष्यता: !

हिन्दू धर्म में कुंभ मेले का खास महत्व है ! यह कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है ! कहते हैं महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता कमजोर पड़ गए,तब राक्षसों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया था ! सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत सुनाया !

तदा भगवतः नारायण: देवान् दैत्यै: सह मेलित्वा क्षीरसागरस्य कृत्वा पीयूषम् निस्सरस्य उपदिष्ट: ! भगवतः नारायणस्य इदृशं कथने देवा: निशाचरेण सह सन्धि कृत्वा पीयूषम् निस्सरस्य प्रयासे निरता: !

तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी ! भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता राक्षसों के साथ संधि करके अमृत निकालने के प्रयास में लग गए !

समुद्र मंथनेण पीयूषम् निस्सरतैव देवानां संकेते इंद्रपुत्र जयंत: घटम् गृहित्वाकाशे उड्डीत: ! तस्य अनंतरम् दैत्य गुरु शुक्राचार्यस्याज्ञायाम् निशाचराः पीयूषमानितुम् जयंतस्याभिधावता: !

समुद्र मंथन से अमृत निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्र पुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गया ! उसके बाद दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर राक्षसों ने अमृत लाने के लिए जयंत का पीछा किया !

अतिपरिश्रमानंतरम् ते मध्य मार्गैव जयंतम् अवरुद्धा: अमृतघटे अधिपत्तुम् देव: दानवे १२ दिवसैव भयकरः रणम् चरिता: ! कथ्यन्ते तत अस्य रणस्य कालम् भूम्या: चत्वारः स्थानेषु अमृतघटात् पीयूषस्य शीकर: पतितम् स्म !

घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा और अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव और दानव में 12 दिन तक भयंकर युद्ध होता रहा ! कहते हैं कि इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों पर अमृत कलश से अमृत की बूंदे गिरी थी !

यस्मात् प्रथम शीकर: प्रयागे पतितम् द्वितीय शिवस्य नगर्याम् हरिद्वारे अस्यानंतरम् तृतीय शीकर: उज्जैने तदा चतुर्थ शीकर: नासिके पतितम् ! इदमेव कारणमस्ति तत कुंभस्य मेलकानि इदमेव चत्वारि स्थानेषु मान्यन्ते ! देवानां १२ दिवसं,मानवस्य १२ वर्षस्य समा भवन्ति !

जिनमें से पहली बूंद प्रयाग में गिरी तो दूसरी शिव की नगरी हरिद्वार में इसके बाद तीसरी बूंद उज्जैन में तो चौथी बूंद नासिक में गिरी ! यही कारण है कि कुंभ के मेले को इन्हीं चार स्थानों पर मनाया जाता है ! देवताओं के 12 दिन, मनुष्य के 12 वर्ष के तुल्य होते हैं !

अतः कुंभमपि १२ भवन्ति ! तस्मात् ४ कुंभ भूम्याम् भवन्ति शेष ८ कुंभ च् देवलोके भवन्ति, येन देवगण: इव प्राप्तुम् शक्नोन्ति ! चरतु ज्योतिषस्यानुरूपम् ज्ञायति तत अंततः कुंभ पर्वस्यायोजनस्य तिथिम् स्थानम् च् कीदृशं निर्धारितम् क्रियते !

अतः कुंभ भी 12 होते हैं ! उनमें से 4 कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष 8 कुंभ देवलोक में होते हैं,जिन्हें देवगण हि प्राप्त कर सकते हैं ! चलिए ज्योतिष के अनुसार जानते है कि आखिर कुंभ पर्व के आयोजन की तिथि और जगह कैसे निर्धारित की जाती है !

कुंभ,महाकुंभ,अर्धकुंभ सिंहस्थ च् कास्ति ?

कुंभ,महाकुंभ,अर्धकुंभ और सिंहस्थ क्या है ?

कलशं कुंभ इति कथ्यते ! कुंभस्यार्थ भवति घट: ! कुंभ पर्व ४ अंशेषु वितरन् ! यथैव यदि प्रथम कुंभ हरिद्वारे भवति तदा तत्काल तस्य ३ वर्षानंतरम् द्वितीय कुंभ प्रयागे पुनः च् तृतीय कुंभ ३ वर्षानंतरम् उज्जैने,पुनः च् ३ वर्षानंतरम् चतुर्थ कुंभ नासिके भवति !

कलश को कुंभ कहा जाता है ! कुंभ का अर्थ होता है घड़ा ! कुंभ पर्व 4 हिस्सों में बंटा हुआ ! जैसे कि अगर पहला कुंभ हरिद्वार में होता है तो ठीक उसके 3 साल बाद दूसरा कुंभ प्रयाग में और फिर तीसरा कुंभ 3 साल बाद उज्जैन में,और फिर 3 साल बाद चौथा कुंभ नासिक में होता है !

अस्यैव प्रकारम् ४ कुंभ पर्वम् मेलित्वा १२ वर्षम् भवन्ति ! तदा महाकुंभार्थतः पूर्णकुंभ मान्यते ! शास्त्रेषु ज्ञापयतु तत पृथ्व्या: एकवर्ष देवानां दिवसं भवति,अतएव प्रत्येक १२ वर्षे एके स्थाने पुनः कुंभस्य आयोजनं भवति !

इसी तरह 4 कुंभ पर्व को मिलाकर 12 वर्ष हो जाते हैं ! तब महाकुंभ यानि पूर्ण कुंभ मनाया जाता है ! शास्त्रों में बताया गया है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता है, इसलिए हर 12 वर्ष पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है !

देवानां १२ वर्षम् पृथ्वी लोकस्य १४४ वर्षस्य अनंतरम् आगच्छति ! इदृशी मान्यतामस्ति तत १४४ वर्षस्यानंतरम् स्वर्गैपि कुंभस्य आयोजनं भवति,अतएव तं वर्षम् पृथ्व्याम् महाकुंभस्य आयोजनं भवति !

देवताओं का 12 वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है ! ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है, इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है !

अर्धकुंभ कास्ति ? पौराणिक ग्रन्थेषु अपि कुंभस्य अर्धकुंभस्य च् आयोजनं गृहित्वा ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्धमस्ति ! कुंभपर्व प्रत्येक ३ वर्षस्यानंतरे हरिद्वारेणारम्भयति ! हरिद्वारस्यानंतरम् कुंभपर्व प्रयागे नासिके उज्जैने च् मान्यन्ति !

अर्धकुंभ क्या है ? पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है ! कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है ! हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है !

प्रयागे हरिद्वारे च् मान्यता कुंभपर्वे प्रयागे नासिके च् मान्यता कुंभपर्वस्य मध्ये ३ वर्षाणां अंतरं भवति ! अत्र माघ मेलकम् संगमे आयोजितम् एकम् वार्षिकम् समारोहमस्ति !

प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है ! यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है !

सिंहस्थस्य संबंध सिंह राश्यास्ति ! सिंह राश्याम् वृहस्पत्या: मेष राश्याम् सूर्यस्य च् प्रवेशे उज्जैने कुंभस्य आयोजनं भवति ! अस्यातिरिक्त सिंह राश्याम् वृहस्पत्या: प्रवेशने कुंभपर्वस्य आयोजनं गोदावर्या: तटे नासिके भवति !

सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है ! सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है ! इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है !

येन महाकुंभापि कथ्यन्ति,कुत्रचित इदम् योग १२ वर्षानंतरमेव आगच्छति ! अस्य कुंभस्य कारणमेव इयम् धारणा प्रचलित भवितम् तत कुंभ मेलकस्यायोजनं प्रत्येक १२ वर्षे भवति, यद्यपि अयम् सद् नास्ति !

इसे महाकुंभ भी कहते हैं,क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है ! इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई कि कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है,जबकि यह सही नहीं है !

हरिद्वारे कुंभ:-हरिद्वारस्य संबंध मेष राश्यास्ति ! कुंभ राश्याम् वृहस्पत्या: प्रवेशने मेष राश्याम् सूर्यस्य प्रवेशने च् कुंभस्य पर्व हरिद्वारे आयोजितं क्रियते ! हरिद्वारे प्रयागे च् द्वयो कुंभ पर्वयो मध्य ६ वर्षस्यांतराले अर्धकुंभस्यापि आयोजनं भवति !

हरिद्वार में कुंभ:-हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है ! कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है ! हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है !

प्रयागे कुंभ:-प्रयाग कुंभस्य विशेषं महत्वातएव अस्ति कुत्रचित इदम् १२ वर्षाणां अनंतरम् गंगायाः,यमुनायाः सरस्वत्या: च् संगमे आयोजितम् क्रियते ! ज्योतिषशास्त्रिणाम् अनुरूपम् यदा वृहस्पति कुंभ राश्याम् सूर्य मेष राश्याम् च् प्रवेशयति तदा कुंभ मेलकस्यायोजनं प्रयागे क्रियते !

प्रयाग में कुंभ:-प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है ! ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है !

अन्य मान्यतामनुसारम् मेष राश्या: चक्रे वृहस्पत्या: सूर्यस्य च् चन्द्रस्य च् मकर राश्याम् प्रवेशने अमाया: दिवसं कुंभस्य पर्व प्रयागे आयोजितं क्रियते ! एकमन्यम् गणनायाः अनुरूपम् मकर राश्याम् सूर्यस्य वृष राश्याम् वृहस्पत्या: च् प्रवेशनयो कुंभ पर्व प्रयागे आयोजितम् भवति !

अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है ! एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है !

नासिके कुंभ:-१२ वर्षेषु एकदा सिंहस्थ कुंभ मेलकम् नासिके त्रयम्बकेश्वरे च् आयोजितं भवति ! सिंह राश्याम् वृहस्पत्या: प्रवेशने कुंभ पर्व गोदावर्या: तटे नासिके भवति ! अमायाः दिवसं वृहस्पत्या:,सूर्यस्य चन्द्रस्य च् कर्क राश्याम् प्रवेशने अपि कुंभ पर्व गोदावरी तटे आयोजितं भवति !

नासिक में कुम्भ:-12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है ! सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है ! अमावस्या के दिन बृहस्पति,सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है !

उज्जैने कुंभ:-सिंह राश्याम् वृहस्पति मेष च् राश्याम् सूर्यस्य प्रवेशने अयम् पर्व उज्जैने भवति ! अस्यातिरिक्त कार्तिकामायाः दिवसं सूर्येण चन्द्रेण च् सह भवे वृहस्पत्या: तुला राश्याम् प्रवेशने च् मोक्षदायक कुंभ उज्जैने आयोजितं भवति !

उज्जैन में कुंभ:-सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है ! इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है !

सम्प्रत्या: हरिद्वारे भविष्यति महाकुंभ !

अबकी हरिद्वार में होगा महाकुंभ !

देवानां भू उत्तराखंडस्य हरिद्वारे अस्य वर्षम् कुंभ मेलकस्यायोजनं भवति ! माघ पूर्णिमायाम् २७ फरवरी तः कुंभ मेलकस्यारंभ भविष्यति इदम् २७ अप्रैल एव चरिष्यति च् ! इतिदा ११ वर्षे इव हरिद्वारे पूर्ण कुंभ भवति !

देवों की धरती उत्तराखंड के हरिद्वार में इस वर्ष कुंभ मेले का आयोजन हो रहा है ! माघ पूर्णिमा पर 27 फरवरी से कुंभ मेले की शुरुआत होगी और यह 27 अप्रैल तक चलेगा ! इस बार 11 साल पर ही हरिद्वार में पूर्ण कुंभ लग रहा है !

हरिद्वारे महाकुंभायोजनस्य योग२०२२ ख्रिष्टाब्दे न,अपितु २०२१ ख्रिष्टाब्दैव निर्मयति ! विद्वत परिषदस्य गोष्ठ्याम् मंथनस्यानंतरम् अयम् निर्णीताः तत मेष राश्याम् सूर्य,कुंभ राश्याम् वृहस्पति भवे च् हरिद्वारे महाकुंभस्यायोजनं भवति ! २०२२ ख्रिष्टाब्दे वृहस्पति कुंभ राश्याम् न रमस्यते !

हरिद्वार में महाकुंभ आयोजन का योग 2022 में नहीं,बल्कि 2021 में ही बन रहा है ! विद्वत परिषद की बैठक में मंथन होने के बाद यह निर्णय लिया गया कि मेष राशि में सूर्य तथा कुंभ राशि में बृहस्पति होने पर हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन होता है ! 2022 में बृहस्पति कुंभ राशि में नहीं रहेंगे !

शंकराचार्या:,आचार्या: हरिद्वारस्य च् काश्या: च् विद्वत परिषदेण चर्चाम् कृत,उज्जयिनी विद्वत परिषदस्य गोष्ठियाम् अस्य विषये मंथन कृतमानः येन वर्षम् २०२१ ख्रिष्टाब्दे मान्यस्य निश्चयता: !

शंकराचार्यों,आचार्यों तथा हरिद्वार और काशी की विद्वत परिषद से चर्चा कर,उज्जयिनी विद्वत परिषद की बैठक में इस विषय पर मंथन करते हुए इसे वर्ष 2021 में मनाए जाने का निश्चय किया गया !

प्रथम शाही स्नानम् महाशिवरात्रिम् ११ मार्च २०२१ ख्रिष्टाब्दम्,द्वितीय स्नानम् सोमवती अमां १२ अप्रैल २०२१ ख्रिष्टाब्दम्,तृतीय स्नानम् वैशाखी १४ अप्रैल २०२१ ख्रिष्टाब्दम् चतुर्थ स्नानम् चैत्र पूर्णिमाम् २७ अप्रैल २०२१ ख्रिष्टाब्दम् संपन्नम् भविष्यति ! यस्मिन् बहु वृहद संख्यायाम् साधु संतानां सम्मर्द: भविष्यति !

पहला शाही स्नान महाशिवरात्रि को 11 मार्च 2021,दूसरा स्नान सोमवती अमावस्या 12 अप्रैल 2021,तीसरे स्नान बैशाखी 14 अप्रैल 2021 व चौथा स्नान चैत्र पूर्णिमा को 27 अप्रैल 2021 को संपन्न होगा ! जिसमें बहुत बड़ी संख्या में साधु संतों का जमघट लगेगा !

ब्रह्मपुराणस्य स्कंधपुराणस्य च् श्लोकानां माध्यमेन येनावगतुम् शक्नोति !

ब्रह्म पुराण एवं स्कंध पुराण के श्लोकों के माध्यम से इसे समझा जा सकता है !

विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते,एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये !

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