कर्म व्यवहार

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स्वार्थ : स्वयं की प्रगति, प्रतिष्ठा व प्रसन्नता के लिये किया गया कार्यl यह हमारा स्वयं के प्रति प्रेम व कर्तव्य है, जो हम स्वयं की अपेक्षाओं की पूर्ती हेतु करते है, जिसमे गर्व जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए l अपने भले के विशय में सोचना आवश्यक है किन्तु दुसरो की हानि कर मात्र अपने विशय में सोचना इस स्वार्थी व्यवहार से हमें बचना चाहिए l

कर्तव्य : पारिवारिक नैतिक सामाजिक व मौलिक धर्म की पूर्ती के लिये किया गया कार्य व अनुदान, कर्तव्यभाव से करना अपने धर्म का वहन है, इसमें महानता व कृतघ्नता जैसे भाव की अपेक्षा रखना अनुचित है l कर्तव्य वहन से हम ऋणमुक्त रहते हैं इस लिए कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा के साथ करना चाहिएl

सहायता : किसी स्वजन की स्वयं की आत्म संतुष्टि के लिए आवश्यक समय आने पर सहायता करना व अनुदान देना सम्बन्धो के उत्तर्दाइत्वों की पूर्ति हेतु किया हुआ कार्य हैl यह आपकी व्यक्ती विशेष के प्रति प्रेम भाव की अभिव्यक्ति है l जिसके लिये स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिय्र की व्यक्ती ने आप पर विश्वास किया और परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिए की उन्होंने आपको समर्थ व संवेदनशील बनायाl जिन्हे हम स्वजन मानते हो उनकी सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है l

परोपकार : सर्व समाज की सकुशलता व सहायता हेतु किया गया धर्म अनुसार कार्य इससे आत्म संतुष्टि का भाव उत्पन्न होता है l अपेक्षाहीन परोपकार आपको आनंद व आत्मसंतुष्टी प्रदान करते हैँ l समय समय पर परोपकार करते रहना चाहिए इससे वंचित वर्ग की सहायता होती है और व्यक्ति के पुण्य कर्मों में वृद्धि होती हैl

व्यापार : किसी भी सेवा या वस्तु के बदले में अर्थ व पदार्थ का आदान प्रदान व्यापार कहा गया है l जैसे किसी से गृह कार्य मे सहायता लेकर बदले में भोजन देना, किसी व्यक्ति से शारीरिक श्रम, या निजी कार्यों में हाथ बटवाना और बदले में धनराशि देना इत्यादि l इसमें दोनों ही पक्षो को गर्व आभार कृतघ्नता अभिमान जैसे भाव रखना मूर्खता है l व्यापार आवश्यकता अनुसार ही करना चाहिए l

जिया मंजरी

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