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अहम् हिंदू अस्मि, नाहम् ब्राह्मण:, नाहम् क्षत्रिय:, नाहम् वैश्य:, नाहम् शुद्र:, केवलमहम् हिंदू अस्मि मया च् गर्वमस्ति हिन्दू हिंदुस्तानी च् भवे ! मैं हिंदू हूँ, न मैं ब्राह्मण, न मैं क्षत्रिय, न मैं वैश्य, न मैं शुद्र, केवल मैं हिंदू हूँ और मुझे गर्व है हिंदू और हिंदुस्तानी होने पर !

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ओशो: कथितः यदाया अहम् जागृत: अभवम्, सततं शृणोमि तत बणिज: कृपण: भवति, दिवाकीर्ति चतुर: भवति, ब्राह्मण: धर्मस्य नामे सर्वान् अल्पबुद्धि निर्मयति, यादवस्य बुद्धि क्षीण भवति !

ओशो ने कहा जब से मैंने होश संभाला है, लगातार सुन रहा हूँ कि बनिया कंजूस होता है, नाई चतुर होता है, ब्राह्मण धर्म के नाम पर सबको बेवकूफ बनाता है, यादव की बुद्धि कमजोर होती है !

राजपूत: अवमर्द: भवन्ति, दलित: अभद्र: भवन्ति, जाट: गुर्ज्जर: अकारणं रणक: भवन्ति, मारवाड़ी: लोलुभ: भवन्ति ! अन्य न ज्ञातं इदृशैव कति असत्यं परम् ज्ञानस्य वार्तानि सर्वान् हिंदून् शनैः-शनैः शिक्षितानि !

राजपूत अत्याचारी होते हैं, दलित गंदे होते हैं, जाट और गुर्ज्जर बेवजह लड़ने वाले होते हैं, मारवाड़ी लालची होते हैं ! और ना जाने ऐसी कितनी असत्य परम ज्ञान की बातें सभी हिन्दुओं को आहिस्ते-आहिस्ते सिखाई गयी !

परिणामात्मविश्वासस्य न्यूनता ! परस्परस्य जातिषु संदेह: द्वेष: च् शनैः-शनैः परस्परेषु घनाघन: भवितुमारंभितानि अंतिम च् परिणाम अभवत् तत दृढ़, कर्मयोगी सहिष्णु च् हिंदू समाज परस्परेषु इव रणित्वा क्षीणम् भविष्यते !

नतीजा हीन भावना ! एक दूसरे की जाति पर शक और द्वेष धीरे-धीरे आपस में टकराव होना शुरू हुआ और अंतिम परिणाम हुआ कि मजबूत, कर्मयोगी और सहिष्णु हिन्दू समाज आपस में ही लड़कर कमजोर होने लगा !

तान् तस्य लक्ष्यम् लब्धितानि ! सहस्रात् वर्षात् भवद्भिः सहासन्, भवद्भिः योद्धुम् कठिनम् आसीत्, सम्प्रति भवतः लुप्यतुम् सरलमस्ति !

उनको उनका लक्ष्य प्राप्त हुआ ! हजारों साल से आप साथ थे, आपसे लड़ना मुश्किल था, अब आपको मिटाना आसान है !

भवतः पृच्छनीयाः स्म ततानाचारिण: राजपूता: सर्वानां जातिनां रक्षणाय सदैव स्व रक्तम् किं पतिता: ?

आपको पूछना चाहिए था कि अत्याचारी राजपूतों ने सभी जातियों की रक्षा के लिए हमेशा अपना खून क्यों बहाया ?

भवतः पृच्छनमासीत् तत यदि दलितं ब्राह्मण: इत्येवाभद्रावगम्यति स्म तदा बाल्मीकि रामायण यत् एकः दलित: अलिखत् तस्य सर्वाणि पूजनं किं कुर्वन्ति ?

आपको पूछना था कि अगर दलित को ब्राह्मण इतना ही गन्दा समझते थे तो बाल्मीकि रामायण जो एक दलित ने लिखा उसकी सभी पूजा क्यों करते हैं ?

मातु सीता किं महर्षि बाल्मीकिण: आश्रमे रमिता ! भवन्तः न पृच्छताः तत भवतः स्वर्णस्य चटका निर्माणे मारवाड़ीनां बणिजानां च् का योगदानमासन् ?

माता सीता क्यों महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में रहती ! आपने नहीं पूछा कि आपको सोने का चिड़ियाँ बनाने में मारवाड़ियों और बनियों का क्या योगदान था ?

सर्वाणि मंदिराणि, विद्यालयाणि, चिकित्साल्याणि निर्माता: लोक कल्याणस्य कार्यकर्ता: बणिजा: भवन्ति, सर्वानोद्यमदाता: बणिजा: भवन्ति सर्वातधिकम् आयकर दाता: बणिजा: भवन्ति !

सभी मंदिर, स्कूल, हॉस्पिटल बनाने वाले लोक कल्याण का काम करने वाले बनिया होते हैं, सभी को रोजगार देने वाले बनिया होते हैं सबसे ज्यादा आयकर देने वाले बनिया होते हैं !

येन डोमम् भवन्तः अधम मानिता:, तेषु हस्तात् दत्ताः अग्नि तः भवतः मुक्तिम् किं लब्धन्ति ?

जिस डोम को आपने नीच मान लिया, उसी के हाथ से दी गई अग्नि से आपको मुक्ति क्यों मिलती है ?

जाट: गुर्जर: च् यदि परिश्रमी रणका: न भविताः तदा भवद्भ्यः अन्नस्य उत्पादनं का कृता: सैन्ये का गमिता: ?

जाट और गुर्जर अगर मेहनती लड़ाके नहीं होते तो आपके लिए अन्न का उत्पादन कौन करता, सेना में भर्ती कौन होता ?

यथैव कतिपय कश्चित जातिनां, कतिपय सामान्यैवापि, असाधु वार्ता कृता:, तेन अवरोधयन्तु आक्षेपयन्तु च् !

जैसे ही कोई किसी जाति की, कोई मामूली सी भी, बुरी बात करे, उसे टोकिये और ऐतराज़ कीजिये !

स्मृताः, भवन्तः केवलं हिंदू सन्ति ! हिंदू ताः यत् हिंदुस्ताने वसितुम् आगताः ! वयं कदापि कश्चित अन्य धर्मस्य न अपकृताः तदा पुनः स्व हिंदू भ्रातृन् कीदृशं अपमानिता: किं च् ?

याद रहे, आप सिर्फ हिन्दू हैं ! हिन्दू वो जो हिन्दूस्तान में रहते आये हैं ! हमने कभी किसी अन्य धर्म का अपमान नहीं किया तो फिर अपने हिन्दू भाइयों को कैसे अपमानित करते और क्यों ?

सम्प्रति नापमानिष्यते न भवितुम् दाष्यते च् ! एका: रमिता: सशक्ता: रमिताः ! संयुक्तवा दृढ़ भारतस्य निर्माणम् कुर्वन्तु !

अब न अपमानित करेंगे और न होने देंगे ! एक रहें सशक्त रहें ! मिलजुल करके मजबूत भारत का निर्माण करो !

अहम् ब्राह्मण: अस्मि, यदाहम् पठामि पाठयामि च् ! अहम् क्षत्रिय: अस्मि, यदाहम् स्व कुटुंबस्य रक्षणं करोमि ! अहम् वैश्य: अस्मि, यदाहम् स्व गृहस्य प्रबंधनं करोमि ! अहम् शुद्र: अस्मि, यदाहम् स्व गृहम् स्वच्छम् धृतामि !

मैं ब्राम्हण हूँ, जब मैं पढ़ता हूँ और पढ़ाता हूँ ! मैं क्षत्रिय हूँ, जब मैं अपने परिवार की रक्षा करता हूँ ! मैं वैश्य हूँ, जब मैं अपने घर का प्रबंधन करता हूँ ! मैं शूद्र हूँ, जब मैं अपना घर साफ रखता हूँ !

इमे सर्वाणि ममाभ्यांतरमस्ति एतानि सर्वानां संयोजनेनाहम् निर्मितोस्मि ! किं ममास्तित्वेण कश्चित एकम् क्षणमपि यै: भिन्न कर्तुम् शक्नोन्ति ?

ये सब मेरे भीतर है इन सबके संयोजन से मैं बना हूँ ! क्या मेरे अस्तित्व से किसी एक क्षण भी इन्हें अलग कर सकते हैं ?

किं कश्चितापि जातिनां हिन्दूनां अभ्यांतरात् ब्राह्मणं, क्षत्रियं, वैश्यं शुद्रं वा भिन्न कर्तुम् शक्नोन्ति ?

क्या किसी भी जाति के हिन्दू के भीतर से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र को अलग कर सकते हैं ?

वस्तुतः सदेयमस्ति तत वयं प्रातः तः रात्रि एव एतानि चतुर्णाम् वर्णानां मध्य परिवर्तयन्ति ! मया गर्वमस्ति तताहम् एकः हिंदू अस्मि ! मम खंड-खंड कृतस्य प्रयत्नम् मा कुर्वन्तु ! अहम् हिंदू अस्मि हिन्दुस्तानस्य, अहम् परिचयमस्मि हिन्दुस्तानस्य !

वस्तुतः सच यह है कि हम सुबह से रात तक इन चारों वर्णों के बीच बदलते रहते हैं ! मुझे गर्व है कि मैं एक हिंदू हूँ ! मेरे टुकड़े-टुकड़े करने की कोई कोशिश न करे ! मैं हिन्दू हूँ हिन्दुस्तान का, मैं पहचान हूँ हिन्दुस्तान का !

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