ज्ञायतु अक्षय तृतीया कदास्ति, इति दिवसं कर्तुं शक्नोति कश्चितापि शुभकार्यम् ! जानिए अक्षय तृतीया कब है, इस दिन कर सकते हैं कोई भी शुभ कार्य !

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हिंदू धर्मशास्त्राणां अनुसारमक्षय तृतीयायाः तिथि बहु इव शुभ मंगलकारिन् मान्यते ! अक्षय तृतीया प्रत्येक वर्षम् वैशाखमासस्य शुक्लपक्षस्य तृतीया तिथिम् मान्यते ! इतिदा ३ मई दिवस भौमवासरम् अक्षय तृतीया मानिष्यते !

हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीया की तिथि बहुत ही शुभ और मंगलकारी मानी जाती है ! अक्षय तृतीया हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है ! इस बार 3 मई दिन मंगलवार को अक्षय तृतीया मनाई जाएगी !

इदम् बहु इव शुभपर्वमस्ति इति दिवसं च् कृतं कश्चितापि शुभकार्यं अक्षयफलदाता मान्यते ! अक्षय तृतीयामाखा तीज इत्या: नाम्नापि ज्ञायते ! वैशाख शुक्ल तृतीया तिथ्याः अधिष्ठात्री देवी माता गौरी अस्ति !


यह बेहद ही शुभ पर्व है और इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल देने वाला माना जाता है ! अक्षय तृतीया को आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है ! वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि की अधिष्ठात्री देवी माता गौरी हैं !

अतः माता गौरीम् साक्षी कृत्वा कृतं धर्म-कर्म एवं दत्तं दान अक्षय भवते, अतएव इति तिथिम् अक्षय तृतीया कथितं ! इति दिवसं कश्चितापि मांगलिकम् शुभकार्यम् च् कृते फलदाता मान्यते !

अत: माता गौरी को साक्षी मानकर किया गया धर्म-कर्म एवं दिया गया दान अक्षय हो जाता है, इसलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया कहा गया है ! इस दिन कोई भी मांगलिक और शुभ कार्य करना फलदायी माना जाता है !

पुराणेषु ग्रन्थेषु च् वर्णितमस्ति तत यदि संपूर्ण वर्षम् दान न कृतवन्तः तर्हि इति दिवसं दानावश्यम् करणीयं ! इति दिवसं कृतन् दानस्य पुण्यलाभम् बहु गुणितमधिकं ळब्धते ! भगवतः विष्णु वैशाख शुक्ल तृतीया तिथिम् प्रदोषकाले ऋषि जमदग्निण: मातु: रेणुकायाः गृहम् चतुर्थ संतत्याः रूपे जन्म अलभत् स्म !

पुराणों और ग्रंथों में वर्णित है कि अगर साल भर दान नहीं किया है तो इस दिन दान जरूर करना चाहिए ! इस दिन किए गए दान का पुण्य फल कई गुणा अधिक प्राप्त होता है ! भगवान विष्णु ने वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को प्रदोष काल में ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के घर चौथी संतान के रुप में जन्म लिया था !

परशुराम महोदयः भगवतः शिवस्य परम् भक्त: आसीत् ! सः स्वकठिन्य तपश्चर्यायाः भगवतः शिवम् प्रसन्नम् कृतः स्म, तदा सः वर: स्वरूपम् तं स्वैकं अस्त्रम् परशु प्रदत्त: स्म ! विष्णुपुराणस्यानुसारम् परशुराम महोदयस्य वास्तविक नाम रामः धृतं स्म ! परशुधारणस्य कारणेन ते परशुराम: भवेत् !

परशुराम जी भगवान शिव के परम भक्त थे ! उन्होंने अपनी कठोर तपस्या से भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न किया था, तब उन्होंने वरदान स्वरुप उनको अपना एक अस्त्र परशु यानी फरसा दिया था ! विष्णु पुराण के अनुसार परशुराम जी का मूल नाम राम रखा गया था ! परशु धारण करने की वजह से वे परशुराम कहलाए !

पौराणिक कथानकानां अनुसारम् भगवत: विष्णु परशुराम महोदयं वर: दत्त: स्म तत त्रेतायुगे रामावतारस्यानंतरमपि ते धरायां वासम् करिष्यति तपश्चर्यायां च् रमिष्यति ! इति आधारे कथ्यते तत परशुराम महोदयः अद्यापि जीवितमस्ति !

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने परशुराम जी को वरदान दिया था कि त्रेता युग में रामावतार होने के बाद भी वे पृथ्वी पर वास करेंगे और तपस्या में लीन रहेंगे ! इस आधार पर कहा जाता है कि परशुराम जी आज भी जीवित हैं !

बद्यते तत त्रेतायुगे भगवतः श्रीराम: तं सुदर्शन चक्रम् दत्त: स्म कुत्रचित द्वापरयुगे भगवतः श्रीकृष्ण: दत्तुं शक्नुत: ! पुनः द्वापरयुगे परशुराम महोदयः श्रीकृष्णं तस्य गुरुकुले चक्रम् प्रदत्त: !

बताया जाता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने उनको सुदर्शन चक्र दिया था ताकि वे द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण को दे सकें ! फिर द्वापर युग में परशुराम जी ने श्रीकृष्ण को उनके गुरुकुल में चक्र सौंप दिया !

भगवतः परशुराम: शस्त्रविद्यायां पारंगतमासीत् ! सः भीष्मम्, द्रोणम् कर्णम् च् शस्त्र विद्या दत्तमासीत् ! कथ्यते तत कलयुगे यदा भगवतः विष्णो: कल्कि अवतारम् भविष्यति तर्हि भगवतः परशुराम: तं शस्त्र विद्यायाः ज्ञानम् दाष्यति !

भगवान परशुराम शस्त्र विद्या में पारंगत थे ! उन्होंने भीष्म, द्रोण और कर्ण को शस्त्र विद्या दी थी ! कहा जाता है कि कलयुग में जब भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होगा तो भगवान परशुराम उनको शस्त्र विद्या का ज्ञान देंगे !

पौराणिक कथानकानां अनुसारम्, क्षत्रियाणां दंभम् त्रोटितुं भगवतः परशुराम: एकविंशतिदा तस्य संहारं कृतवान ! एकदा परशुराम महोदयः भगवतः शिवेण मेलितुं कैलाशपर्वते प्राप्त: तर्हि गणेश महोदयः तं अवरोधित: !

पौराणिक कथाओं के अनुसार, क्षत्रियों के दंभ को तोड़ने के लिए भगवान परशुराम ने 21 बार उनका संहार किया ! एक बार परशुराम जी भगवान शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर पहुंचे तो गणेश जी ने उनको रोक लिया !

ते तं मेलितुं न ददाति स्म ! तदा सः खिन्न: भूत्वा गणेश महोदये परशुतः घातम् कृतवान, यस्मात् गणेश महोदयस्य एकं दंतम् त्रोटितं ! इति कारणेन गणेश महोदयः एकदन्त: अभवत् !

वे उनको मिलने नहीं दे रहे थे ! तब उन्होंने क्रोधित होकर गणेश जी पर परशु से वार कर दिया, जिससे गणेश जी का एक दांत टूट गया ! इस वजह से गणेश जी एकदंत कहलाए !

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