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Tuesday, November 30, 2021

अंतम् षडदा अभियोगम् विजयस्य उपरांत किं न निर्मितम् मन्दिरम् ? आखिर 6 बार मुकदमा जीतने के बाद क्यों नहीं बना मंदिर ?

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साभार भगवा ब्रिग्रेड !

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शिवाजी महाराजस्य मराठा शक्तिसि कारणम् भारते हिन्दू पद पाद शाहीम् स्थापितं भवति स्म मुगलम् च् पराभूतम् भवेत् स्म ! दिल्ल्यां केवलम् नाम मात्रम् मुगल शासकं, तदा मराठा: श्रीकृष्ण जन्मभूमिम् कटरा केशवदासम् च् मुक्तम् अघोषयत् ! अयम् अस्ति हिन्दूनाम् सत !एकम् प्रति भवान् प्राप्यिष्यति तत येन कश्चितपि मुस्लिम आक्रांतास्य मथुरे आधिपत्यम् अभवत् ते मन्दिरम् त्रोटस्य नव कीर्तिमानम् स्थापयत् ! सः गजनी: असि लोदी: असि औरंगजेब: वा ! यदा हिन्दू मराठानाम् मथुरे आधिपत्यम् अभवत् तर्हि मस्जिद त्रोटस्य वार्ताम् तर्हि द्रुतम् ते मन्दिरमपि न अनिर्मयत् ! यत्र भगवतः श्रीकृष्णस्य जन्म अभवत् स्म !

शिवाजी महाराज की मराठा शक्ति के कारण भारत में हिन्दू पद पाद शाही स्थापित हो रही थी और मुग़ल पराभूत हो चुके थे ! दिल्ली में बस नाम मात्र को मुगल शासक, तब मराठों ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि और कटरा केशव देव को मुक्त घोषित कर दिया ! यह है हिन्दुओ का सच ! एक तरफ आप पाएंगे कि जिस किसी भी मुस्लिम आक्रान्ता का मथुरा पर कब्जा हुआ उसने मंदिर तोड़ने का नया कीर्तिमान बनाया ! वह गजनी हो लोधी हो या औरंगजेब ! जब हिन्दू मराठों का मथुरा पर कब्ज़ा हुआ तो मस्जिद तोड़ने की बात तो दूर उन्होंने मंदिर भी नहीं बनाया ! जहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था !

१८०२ तमे लार्ड लेक: मराठेषु विजयम् अप्राप्तम् मथुराम् च् आगराम् वा ईस्ट इंडिया कंपनीस्य अधीनस्थ अभवत् ! ईस्ट इंडिया कम्पने लुण्ठस्य विपणनम् कृते आगतवान स्म, तर्हि ते भारतस्य आस्थावानम् हिन्दू समाजस्य श्रद्धाम् मानबिंदुम् च् नीलाम कृतस्य मनम् अकरोत् १८१५ तमे कम्पनी कटरा केशवदेवस्य १३.३७। एकड़स्य अंशस्य निलामिसि घोषणाम् अकरोत् ! येन काशी नरेश पत्निमल: अकृणत् ! अस्य अकृणम् भूमे नृप पत्निमल: एकम् भव्य कृष्ण मंदिर निर्माणम् ऐच्छत् स्म ! परन्तु मुस्लमानाः अस्य अयम् कथित्वा विरोधम् अकरोत् तत निलामीम् केवलं कटरा केशवदेवाय आसीत् !

१८०२ में लार्ड लेक ने मराठो पर जीत हासिल की और मथुरा एंव आगरा ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन चले गए ! ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में लूट का व्यापार करने आयी थी, तो उसने भारत के आस्थावान हिन्दूसमाज की श्रद्धा और मानबिंदु को नीलाम करने का मन बनाया और सन १८१५ में  कम्पनी ने कटरा केशवदेव के १३.३७ एकड़ के हिस्से की नीलामी की घोषणा कर दी ! जिसे काशी नरेश पत्निमल ने खरीद लिया ! इस खरीदी हुई जमीन पर राजा पत्निमल एक भव्य कृष्ण मंदिर बनाना चाहते थे ! किन्तु मुसलमानों ने इसका यह कह कर विरोध किया कि नीलामी केवल कटरा केशवदेव के लिए थी !

विधि स्थितिम् !

कानूनी मामले !

१८७८ तमे मुस्लमानाः प्रथमदा एकम् अभियोगम् पंजीकृतम् अकरोत् ! मुस्लमानाः दावाम् अकरोत् तत कटरा केशवदेव ईदगाहस्य सम्पत्तिम् अस्ति ईदगाहस्य निर्माणम् औरंगजेब: अकरोत् स्म, अतएव इते मुस्लमानानां अधिकारम् अस्ति ! अस्याय मथुरात् प्रमाणम् अयाचते ! तात्कालिकम् मथुराम् जिलाधिकारी: मिस्टर टेलरः मुस्लमानानां दावाम् निरस्त कृतम् अकथयत् तत अयम् क्षेत्रम् मराठाणाम् कालात् स्वतंत्रम् अस्ति ! यत् तत ईस्ट इंडिया कंपनीमपि स्वीकरोति ! येन १८१५ तमे काशी नरेश पत्निमल: निलामे अकृणते ! सः स्व आदेशे अग्रे संयुक्तम् अकथयत् तत नृप पत्निमल: एव कटरा केशवदेवम्, ईदगाहम् आर्श्वस्य पार्श्वस्य च् अन्य निर्माणानाम् मालिकम् अस्ति !

सन १८७८ में मुसलमानों ने पहली बार एक मुकदमा दर्ज कराया ! मुसलमानों ने दावा किया कि कटरा केशवदेव ईदगाह की सम्पति है और ईदगाह का निर्माण औरंगजेब ने कराया था, इसलिए इस पर मुसलमानों का अधिकार है ! इसके लिए मथुरा से प्रमाण मांगे गए ! तात्कालिक मथुरा कलेक्टर मिस्टर टेलर ने मुसलमानों के दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह क्षेत्र मराठो के समय से स्वतंत्र है ! जो कि ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भी स्वीकार किया ! जिसे सन १८१५ में काशी नरेश पत्निमल ने नीलामी में खरीद लिया ! उन्होंने अपने आदेश में आगे जोड़ते हुए कहा कि राजा पत्निमल ही कटरा केशवदेव, ईदगाह और आस पास के अन्य निर्माणों के मालिक है !

द्वयदा अभियोगम् मथुरास्य न्यायाधीश एंथोनीसि न्यायालये अहमद शाह: बनामम् गोपी: ई पी सी धाराम् ४४७/३५२ रूपे पंजीकृतम् अभवत् ! अहमद शाहः अरोपयतु तत ईदगाहस्य प्रहरीम् गोपी:, कटरा केशवदेवस्य पश्चिमी अंशे एकस्य मार्गस्य निर्माणम् करोति ! यदस्य अयम् अंशम् ईदगाहस्य सम्पत्तिम् अस्ति ! अहमद शाहः प्रहरीम् गोपिम् मार्ग निर्मानेन अवरोधयत् ! अस्य अभियोगस्य निर्णयम् कर्तुम्  न्यायाधीश ; अकथयत् तत मार्गम् विवादित भूमिम् वा पत्निमल परिवारस्य सम्पत्तिम् अस्ति ! अहमद शाहेन अरोपयतु अरोपम् अनृतम् अस्ति !

दूसरी बार मुकदमा मथुरा के न्यायाधीश एंथोनी की अदालत में अहमद शाह बनाम गोपी ई पी सी धारा ४४७/३५२ के रूप में दाखिल हुआ ! अहमद शाह ने आरोप लगाया कि ईदगाह का चौकीदार गोपी, कटरा केशवदेव के पश्चिमी हिस्से में एक सड़क का निर्माण करा रहा है ! जबकि यह हिस्सा ईदगाह की संपत्ति है !अमहद शाह ने चौकीदार गोपी को सड़क बनाने से रोक दिया ! इस मुक़दमे का निर्णय सुनाते हुए न्यायधीश ने कहा कि सड़क एवं विवादित जमीन पत्निमल परिवार की संपत्ति है ! अहमद शाह द्वारा लगाये गए आरोप झूठे है !

त्रयदा अभियोगम् १९२० तमे आगरा जनपद न्यायालये पंजीकृतम् अभवत् ! अस्य अभियोगे मथुरासि न्यायाधीश हूपरस्य निर्णयस्य अह्वै अददात् स्म ! (अपीलम् संख्याम् २३६ (१९२१) २७६ (१९२०) वा) अस्य अभियोगस्य निर्णयम् कर्तुम् पुनः न्यायालयम् आदिशत् तत विवादितम् भूमि ईस्ट इंडिया कम्पनेन नृप पत्निमलस्य अबिक्रीयते स्म यस्य भुगतानमपि सः ११४० रूप्यानाम् रूपे अक्रियते ! अतएव विवादित भूमे ईदगाहस्य कोपि अधिकारम् न अस्ति कुत्रचित् ईदगाहम् स्वयम् नृप पत्निमलस्य सम्पत्तिम् अस्ति !

तीसरा मुकदमा सन १९२० में आगरा जिला न्यायलय में दाखिल किया गया ! इस मुक़दमे में मथुरा के न्यायाधीश हूपर के निर्णय को चुनौती दी गयी थी ! (अपील संख्या २३६ (१९२१) एवं २७६ (१९२०) ) इस मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए पुनः न्यायलय ने आदेश दिया कि विवादित जमीन ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजा पत्निमल को बेचीं गयी थी जिसका भुगतान भी वो ११४० रूपये के रूप में कर चुके है ! इसलिए विवादित जमीन पर ईदगाह का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि ईदगाह खुद राजा पत्निमल की संपत्ति है !

चतुर्थदा अयम् अभियोगम् न्यायालये तदा अगच्छत् यदा, १९२८ तमे मुस्लमानाः ईदगाहस्य जीर्णोद्धारस्य प्रयत्नम् अकरोत् ! पुनः न्यायाधीश बिशन नारायण तनखा: निर्णयम् कर्तुम् अकथयत् तत कटरा केशवदेव नृप पत्निमलस्य उत्तराधिकारिणाम् सम्पत्तिम् अस्ति ! मुस्लमानानां एते किमपि अधिकारम् न अस्ति अतएव जिर्णोद्धारम् अवरूद्धयते !

चौथी बार यह मुकदमा अदालत में तब गया जब, १९२८ में मुसलमानों ने ईदगाह की मरम्मत की कोशिश की ! पुनः न्यायधीश बिशन नारायण तनखा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि कटरा केशवदेव राजा पत्निमल के उत्तराधिकारियो की संपत्ति है ! मुसलमानों का इस पर कोई अधिकार नहीं है इसलिए ईदगाह की मरम्मत को रोका जाता है !

१९४४ तमे महामना मदन मोहन मालवीयस्य प्रेरणेन जुगुल किशोर बिरला: समस्त क्षेत्र १३४०० रूप्ये अकृणत् हनुमान प्रसाद पोद्दार:, च् भिकामल अतरिया: मालवीयेन सह मिलित्वा एकम् न्यासम् अरचयत् !

सन १९४४ में महामना मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से जुगुल किशोर बिरला जी ने समस्त क्षेत्र १३४०० रुपए में खरीद लिया और हनुमान प्रसाद पोद्दार, भिकामल अतरिया एवं  मालवीय जी के साथ मिल कर एक ट्रस्ट बनाया !

पंचदा १९४६ तमे अभियोगम् पुनः न्यायालये अगच्छत् ! इतिदापि न्यायालम् कटरा केशवदेवे नृप पत्निमलस्य वंशजानां अधिकारम् अघोषयत् यत् सम्प्रति श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यासस्य सम्पत्तिम् अस्ति ! कुत्रचित येन नृप पत्निमलस्य वंशजानि इति न्यासम् विक्रियते स्म !

पांचवीं बार सन १९४६ में मुकदमा फिर अदालत में गया ! इस बार भी अदालत ने कटरा केशवदेव पर राजा पत्निमल के वंशजो का अधिकार बताया जो अब श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की संपत्ति है ! क्योकि इसे राजा पत्निमल के वंशजो ने इस ट्रस्ट को बेच दिया था !

षड अंतिमदा च् १९६० तमे पुनः न्यायालयम् आदिशतुम् अकथयत् तत मथुरा नगर पालिकास्य दस्तावेजानि द्वितीय सबूतानां अध्ययनम् कृतेन अयम् स्पष्टम् भवति तत कटरा केशवदेवम् यस्मिन् ईदगाहापि सम्मिलितम् अस्ति, तस्य भूमि शुल्क श्रीकृष्ण जन्मभूमि संस्थेनेव ददाति ! यस्मात् अयम् स्पष्टम् भवति तत विवादित भूमे केवलं अस्य न्यासस्य अधिकारम् अस्ति !

छठवीं और अंतिम बार १९६० में पुनः न्यायालय ने आदेश देते हुए कहा कि मथुरा नगर पालिका के बही खातों तथा दूसरे सबूतों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि कटरा केशवदेव जिसमें ईदगाह भी शामिल है, उसका लैंड टैक्स श्रीकृष्ण जन्मभूमि संस्था द्वारा ही दिया जाता है ! इससे यह साबित होता है कि विवादित जमीन पर केवल इसी ट्रस्ट का अधिकार है !

पूर्वे न्यायिक विजयस्य कोपि अर्थम् न, तु षष्ठम् विजयम् देश स्वतंत्रम् भवति उपरांतस्य अस्ति, तम् कालम् कांग्रेसी सरकारं आसीत् तर्हि भवान् ज्ञातुं शक्नोति तत किं भविष्यति ! इयम् पुरातन वार्ताम् अस्ति, हिन्दू विश्वस्य सर्वात् सहिष्णु सभ्यतां अस्ति यत् षडदा न्यायालयेन अभियोगम् विजयस्य उपरंतापि ध्वंसाअवशेषस्य पतित्वा श्रीकृष्ण जन्मभूमे गर्भ गृहस्य निर्माणम् न करोति ध्वंसावशेषस्य च् निकषा न्यासेन निर्मितं भागवत भवनमेव जन्मभूमिम् मानित्वा पूजनम् अर्चनम् करोति !

पूर्व में न्यायिक जीत का कोई मतलब नहीं, लेकिन छठी जीत देश स्वतंत्र होने के बाद का है, उस समय कांग्रेसी सरकार थी तो आप समझ सकते हैं कि क्या हुआ होगा ! यह पुरातन बात है, हिन्दू विश्व की सबसे सहिष्णु सभ्यता है जो छः बार न्यायालय से मुकदमा जीतने के बाद भी ढाँचे को गिराकर श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर गर्भ गृह का निर्माण नहीं कर रही है और ढाँचे के निकट ट्रस्ट द्वारा बने भागवत भवन को ही जन्मभूमि मान कर पूजा अर्चना कर रही है !

किं भारतस्य मुसलमान: वृहद हृदयम् कृत्वा मन्दिरस्य भूमिम् पुनर्दाष्यति पुनः वा अस्य देशस्य १९४७ यथा साम्प्रदायिकम् सौहार्दम् नाशिष्यति इयम् सर्वम् भविष्यसि प्रश्नम् अस्ति यत् वर्तमानेन उत्तरम् यच्छति !

क्या भारत का मुसलमान बड़ा हृदय करके  मंदिर की ज़मीन वापस कर देगा या पुनः इस देश का 1947 जैसा साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ेगा ये सब भविष्य के प्रश्न है जो वर्तमान से जवाब माँगते है !

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