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चित्तौड़गढ़स्य राज्ञी इत्या हुमायूम् रक्षासूत्र प्रेषणस्य कथायाः तथ्यात्मक विश्लेषणं ! चित्तौड़गढ की रानी द्वारा हुमायूं को राखी भेजने की कथा का तथ्यात्मक विश्लेषण !

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उष्णरक्तं, त्वचायाः गन्धस्मरणं धृतवंत: हिंदवः ! रक्षासूत्रस्यैतिहासिकं असत्यं, ख्रीष्टाब्द १५३५ देहल्या: शासक: बाबरस्य पुत्र हुमायूँ ! तस्य संमुखं देशे द्वेसर्वात् वृहदाह्वेयता: सन्ति, प्रथम अफगान शेर खान: द्वितीय गुजरातस्य शासक: बहादुरशाह: !

गर्म रक्त, चमड़ी की गन्ध याद रखना हिंदुओं ! राखी का ऐतिहासिक झूठ, सन् 1535 दिल्ली का शासक है बाबर का बेटा हुमायूँ ! उसके सामने देश में दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं, पहला अफगान शेर खाँ और दूसरा गुजरात का शासक बहादुरशाह !

तु त्रीणि वर्षाणि पूर्वम् १५३२ तमे चुनार दुर्गे अवरुद्धस्य काळम् शेर खान: हुमायो: अधिपत्यं स्वीकृतवान् स्वपुत्रम् च् एकेन सैन्येण सह तस्य सेवायां अददात् ! अहिफेनस्य मद्यक: हुमायूँ शेर खानम् प्रति निश्चिंतमस्ति, आम् पश्चिमतः बहादुर शाहस्य बर्ध्यति भारम् तेन कदा-कदा विचलितं करोति !

पर तीन वर्ष पूर्व 1532 में चुनार दुर्ग पर घेरा डालने के समय शेर खाँ ने हुमायूँ का अधिपत्य स्वीकार कर लिया है और अपने बेटे को एक सेना के साथ उसकी सेवा में दे चुका है ! अफीम का नशेड़ी हुमायूँ शेर खाँ की ओर से निश्चिन्त है, हाँ पश्चिम से बहादुर शाह का बढ़ता दबाव उसे कभी कभी विचलित करता है !

हुमायो: व्यक्तित्वस्य सर्वात् वृहत् दोष: तत सः बहु मद्यक: ! अस्यैव मदस्य कारणमेव सः पूर्व त्रिभिः वर्षभिः देहल्यां अवसत्, उत: च् बहादुर शाह: स्वशक्ति बर्धयति ! सः मालवाम् जय: मेवाड़मपि च् तस्याधीन: !

हुमायूँ के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दोष है कि वह घोर नशेड़ी है ! इसी नशे के कारण ही वह पिछले तीन वर्षों से दिल्ली में ही पड़ा हुआ है, और उधर बहादुर शाह अपनी शक्ति बढ़ाता जा रहा है ! वह मालवा को जीत चुका है और मेवाड़ भी उसके अधीन है !

तु सम्प्रति सभाम् अमीर:, सामन्त: उलेमा च् हुमायूँम् च् शांतिपूर्णेन तिष्ठितुं न ददान्ति ! बहादुर शाहस्य बर्ध्यति शक्तितः सर्वे भीताः सन्ति ! अंततः हुमायूँ उत्थयति मालवाम् प्रति च् बर्धयति ! अस्य काळम् बहादुर शाह: चित्तौड़ दुर्गे वरण: कृतवान् ! चित्तौड़े अवयस्क राणा विक्रमादित्यस्य नामनि राजमाता कर्णावती शासनम् करोति !

पर अब दरबारी अमीर, सामन्त और उलेमा हुमायूँ को चैन से बैठने नहीं दे रहे हैं ! बहादुर शाह की बढ़ती शक्ति से सब भयभीत हैं ! आखिर हुमायूँ उठता है और मालवा की ओर बढ़ता है ! इस समय बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग पर घेरा डाले हुए है ! चित्तौड़ में किशोर राणा विक्रमादित्य के नाम पर राजमाता कर्णावती शासन कर रहीं हैं !

तस्या: इदम् बहुसंकटयुक्त काळम् ! सप्त वर्षाणि पूर्वम् खानुआ इत्या: युद्धे महाराणा सांगाया सह बहवः योद्धा: सेनापति हुतात्मा अभवन् ! राज्ञी इत्या: पार्श्व केचनास्ति, तु विक्रमादित्यस्य उदय सिंहस्य च् रूपे द्वौ अबोधौ बालकौ, एकया: राजपूतन्या: चदम्य साहस: ! सैन्य बले चित्तौड़ बहादुर शाहस्य समक्ष स्थितुमपि न शक्नोति !

उनके लिए यह विकट घड़ी है ! सात वर्ष पूर्व खनुआ के युद्ध में महाराणा सांगा के साथ अनेक योद्धा सरदार वीरगति प्राप्त कर चुके हैं ! रानी के पास कुछ है, तो विक्रमादित्य और उदयसिंह के रुप में दो अबोध बालक और एक राजपूतनी का अदम्य साहस ! सैन्य बल में चित्तौड़ बहादुर शाह के समक्ष खड़ा भी नहीं हो सकता है !

तु साहसिनः राजपूता: बहादुर शाहस्य समक्ष नतै: निषेध: कृतवन्तः ! इतः बहादुर शाहतः समाघातम् निःसृतवान् हुमायूँ सम्प्रति चित्तौड़म् प्रति पर्यावृतवान् ! अधुना सः सारंगपुरे तदा तेन बहादुर शाहस्य संदेशम् ळब्धति यस्मिन् तं अलिखत्, चित्तौड़स्य विरुद्धम् ममायमभियान: विशुद्ध: जेहाद इति !

पर साहसी राजपूतों ने बहादुर शाह के समक्ष शीश झुकाने से इनकार कर दिया है ! इधर बहादुर शाह से उलझने को निकला हुमायूँ अब चित्तौड़ की ओर मुड़ गया है ! अभी वह सारंगपुर में है तभी उसे बहादुर शाह का सन्देश मिलता है जिसमें उसने लिखा है, चित्तौड़ के विरुद्ध मेरा यह अभियान विशुद्ध जेहाद है !

यदैव अहममुस्लिमानां विरुद्धम् जेहाद इत्यां तदैव मयोपरि घातं अइस्लामिकं ! अतः हुमायूँम् वांछनीय: तत सः स्वाभियान: रोधतु ! हुमायो: बहादुर शाहेण कति अपि वैर: तु द्वयो: पंथ: एकः, अतएव हुमायूँ बहादुर शाहस्य जेहाद इत्या: समर्थनम् कृतवान् !

जब तक मैं काफिरों के विरुद्ध जेहाद पर हूँ तब तक मुझ पर हमला गैर-इस्लामिक है ! अतः हुमायूँ को चाहिए कि वह अपना अभियान रोक दे ! हुमायूँ का बहादुर शाह से कितना भी बैर हो पर दोनों का मजहब एक है, सो हुमायूँ ने बहादुर शाह के जेहाद का समर्थन किया है !

सम्प्रति सः सारंगपुरैव निश्चिंततायाः अतिष्ठत्, अग्रम् न बर्धयति ! इतः चित्तौड़ राजमाता केचन राजपूतै: नृपै: सहाय्य याचिष्यति ! सहवासिन: राजपूता: नृपा: सहाय्यायाग्रमागतवन्तः, तु ते न ज्ञायन्ति तत बहादुरशाहम् पराजितुं सम्प्रति न संभव: ! पराजयं निश्चित: अतएव सर्वात् आवश्यकी चित्तौड़स्य भविष्यं सुरक्षितुं !

अब वह सारंगपुर में ही डेरा जमा के बैठ गया है, आगे नहीं बढ़ रहा है ! इधर चित्तौड़ राजमाता ने कुछ राजपूत नरेशों से सहायता मांगी ! पड़ोसी राजपूत नरेश सहायता के लिए आगे आये हैं, पर वे जानते हैं कि बहादुरशाह को हराना अब सम्भव नहीं ! पराजय निश्चित है सो सबसे आवश्यक है चित्तौड़ के भविष्य को सुरक्षित करना !

अतएव रात्र्या: तमे बालक: युवराज: उदय सिंहं पन्ना धायेण सह गुप्त मार्गेण निःसृत्य बूंदी प्राप्तयते ! सम्प्रति राजपूतानां पार्श्व एकमात्र विकल्प: तत युद्धम्, यत् पूर्ण विश्वे केवलं तैव कुर्वन्ति ! शाका जौहर च् ! अष्ट मार्च १५३५, राजपूता: स्वाद्भुत: कौशलम् प्रदर्शस्य स्वीकृतवन्तः !

इसी लिए रात के अंधेरे में बालक युवराज उदयसिंह को पन्ना धाय के साथ गुप्त मार्ग से निकाल कर बूंदी पहुँचा दिया जाता है ! अब राजपूतों के पास एकमात्र विकल्प है वह युद्ध, जो पूरे विश्व में केवल वही करते हैं ! शाका और जौहर ! आठ मार्च 1535, राजपूतों ने अपना अद्भुत जौहर दिखाने की ठान ली है !

सूर्योदयेण सह दुर्गस्य द्वारे उद्घातयतैव ! पूर्ण राजपूत सैन्यम् मस्तके पिण्याकानि उष्णीषानि धारित्वा निःसृतवत् ! अद्य दिवाकर: अपि विरमित्वा तेषां शौर्यम् दर्शितुमिच्छति, अद्य वायु तेषां अतुलित स्वाभिमानिन: योद्धानां चरणम् स्पर्शितुमिच्छन्ति, अद्य धरा स्वशौर्यवान पुत्रान् हृदयेणालिंगतुमिच्छति !

सूर्योदय के साथ किले का द्वार खुलता है ! पूरी राजपूत सेना माथे पर केसरिया पगड़ी बांधे निकली है ! आज सूर्य भी रुक कर उनका शौर्य देखना चाहता है, आज हवाएं उन अतुल्य स्वाभिमानी योद्धाओं के चरण छूना चाहती हैं, आज धरा अपने वीर पुत्रों को कलेजे से लिपटा लेना चाहती है !

अद्येतिहास स्वस्मिन् गर्व: कर्तुमिच्छति, अद्य भारतम् स्वस्य भारतं भूते गर्व: कर्तुमिच्छति ! इतः मृत्यो: आलिंगनम् कर्तुं निःसृतवन्तः शौर्यवान राजपूता: बहादुरशाहस्य सैन्ये विद्युत गतितः खड्गानि चालयन्ति, उत: च् दुर्गस्य अभ्यांतरम् महाराज्ञी कर्णावत्या: पश्च असंख्य देव्य: मुखे गंगाजलम् तुलसीपत्रम् चनयन् अग्निकुंडे प्रवेशयन्ति ! इदम् जौहर इत्यास्ति !

आज इतिहास स्वयं पर गर्व करना चाहता है, आज भारत स्वयं के भारत होने पर गर्व करना चाहता है ! इधर मृत्यु का आलिंगन करने निकले वीर राजपूत बहादुरशाह की सेना पर विद्युतगति से तलवार भाँज रहे हैं, और उधर किले के अंदर महारानी कर्णावती के पीछे असंख्य देवियाँ मुंह में गंगाजल और तुलसी पत्र लिए अग्निकुंड में समा रही हैं ! यह जौहर है !

तत जौहर यत् केवलं राजपूत देव्य: ज्ञायन्ति ! तत जौहर यस्य कारणम् भारत सम्प्रति अपि भारतं ! दुर्गस्य बहिः उष्ण रक्तस्य गंधमप्रसरत्, दुर्गस्य चभ्यांतरम् अग्न्यां प्रवेशयन्ति क्षत्राणिनां गातानां ! पूर्ण वायुमंडलम् दुर्गंधतः परिपूर्णम् अभवत् घृणाया च् नासिकावरुध्य स्थिता प्रकृति यथा चिक्कारित्वा कथ्यति !

वह जौहर जो केवल राजपूत देवियाँ जानती हैं ! वह जौहर जिसके कारण भारत अब भी भारत है ! किले के बाहर गर्म रक्त की गंध फैल गयी है, और किले के अंदर अग्नि में समाहित होती क्षत्राणियों की देहों की ! पूरा वायुमंडल बसा उठा है और घृणा से नाक सिकोड़ कर खड़ी प्रकृति जैसे चीख कर कह रही है !

भारतस्यागन्तुकाः वंशा: ! अमुष्मिन् दिवसं स्मरणं धरोतु, स्मरणं धरोतु च् अस्य गंधम् ! जीवितं प्रज्वलन्ती स्वमातृणां गातस्य गंधम् यदैव त्वया स्मरणं रमिष्यसि, त्वत् सभ्यता जीविष्यसि ! यत् दिवसमिदं गंधम् विस्मरिष्यसि त्वया फारस भूते दश वर्षाणि अपि न भविष्यसि ! द्वे घटके एव चालितं युद्धे स्वयंतः चतुर्गुणित शत्रुन् हनित्वा राजपूता: वीरगति: ळब्धवंत: !

भारत की आने वाली पीढ़ियों ! इस दिन को याद रखना, और याद रखना इस गन्ध को ! जीवित जलती हुई अपनी माताओं के देह की गंध जब तक तुम्हें याद रहेगी, तुम्हारी सभ्यता जियेगी ! जिस दिन यह गन्ध भूल जाओगे तुम्हें फारस होने में दस वर्ष भी नहीं लगेंगे ! दो घण्टे तक चले युद्ध में स्वयं से चार गुने शत्रुओं को मारकर राजपूतों ने वीरगति पा ली है !

अभ्यांतरे दुर्गे बहवः देव्य: स्वक्षारभिः भारतस्य भाले स्वाभिमानस्य तिलक: अददान् ! युद्ध: संपादितमस्ति राजपूता: स्वसभ्यता प्रदर्शवन्त:, सम्प्रति बहादुर शाह: स्वसभ्यता प्रदाक्ष्यते ! आगत त्रीणि दिवसानि एव बहादुर शाहस्य सैन्यं चित्तौड़ दुर्गम् लुंठन्ते !

अंदर किले में असंख्य देवियों ने अपनी राख से भारत के मस्तक पर स्वाभिमान का टीका लगाया है ! युद्ध समाप्त हो चुका है राजपूतों ने अपनी सभ्यता दिखा दी, अब बहादुरशाह अपनी सभ्यता दिखायेगा ! अगले तीन दिन तक बहादुर शाह की सेना चित्तौड़ दुर्ग को लुटती रही !

दुर्गस्याभ्यांतरम् असैन्यं कार्यकर्ता: लौहकार:, कुम्भकार:, पशुपालक:, वणिज: इत्यादयः ग्रहित्वा-ग्रहित्वाकर्तयन् ! तेषां स्त्रिय: अलुण्ठन् ! तेषां बालकान् तोमरस्य क्रोणे लंबित्वा क्रीडाक्रीडन् ! चित्तौड़म् ध्वंसवंत: ! उत: सारंगपुरे अतिष्ठत् बाबरस्य पुत्र हुमायूँ अस्य जेहादम् मौन: दर्शितुं रमति ! प्रसन्न: भवितुं रमति !

किले के अंदर असैनिक कार्य करने वाले लुहार, कुम्हार, पशुपालक, व्यवसायी इत्यादि पकड़ पकड़ कर काटे गए ! उनकी स्त्रियों को लूटा गया ! उनके बच्चों को भाले की नोक पर टांग कर खेल खेला गया ! चित्तौड़ को तहस नहस कर दिया गया ! उधर सारंगपुर में बैठा बाबर का बेटा हुमायूँ इस जेहाद को चुपचाप देखता रहा, खुश होता रहा !

युग: गतवत् तु भारतस्य धरा राजमाता कर्णावत्या: प्रज्वलिता गातस्य गंधम् न विस्मृतवन्तः ! पुनः केचन वंचकाः अस्य गंधम् विस्मरणाय कथारचयन्, राजमाता कर्णावती हुमायो: पार्श्व रक्षासूत्र प्रेषित्वा सहाय्य याचिष्यति स्म, स्वस्वाभिमानस्य रक्षायै मुखे तुलसीदलम् मेलित्वाग्निकुंडे प्रवेशका: देव्य: स्वभर्तु: हन्तकस्य पुत्रेण सहाय्य न याचयन्ति, हिंदवः ! रक्षासूत्रस्यस्यासत्यं कथायाः कुचक्रे कदापि मा रुध्यन्तु !

युग बीत गए पर भारत की धरती राजमाता कर्णावती के जलते शरीर की गंध नहीं भूली ! फिर कुछ गद्दारों ने इस गन्ध को भुलाने के लिए कथा गढ़ी, राजमाता कर्णावती ने हुमायूँ के पास राखी भेज कर सहायता मांगी थी, अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए मुँह में तुलसी दल लेकर अग्निकुंड में उतर जाने वाली देवियाँ अपने पति के हत्यारे के बेटे से सहायता नहीं मांगती, हिंदुओं ! राखी की इस झूठी कथा के षड्यंत्र में कभी मत फंसना !

साभार:-सोशल मीडिया

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